शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

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एक दिन ख्याल आया कि कितना अच्छा हो अगर मैं सेठजी को अपने हाथ से आहार बहराऊँ | पर सेठजी तो वृद्ध थे ,वे तो आहार के लिए उठते ही नहीं थे |तो मैंने अभिग्रह की तपस्या धारण कर ली |अभिग्रह तपस्या का वह स्वरुप है जिसमे अपने मन में धारण की हुई किसी धारणा के पूरा हो जाने पर ही इसे खोलते हैं |
एक दिन ....
दो दिन .......
तीन दिन........निकल गये | गुरुओं को चिंता हुई कि यह क्या माजरा है | चौथा दिन भी आया |तब तक बहुत कमजोरी आ गयी |राम प्रसाद जी हंसने लगे 'तूने तो मरने का इंतजाम कर लिया ' |
सेठजी के पास गयी तो बोली -आज का पच्क्खान (नियम ) भी करा दो जी |
जान तो थी नहीं |मरियल सी आवाज निकल रही थी |
सेठजी बोले -आज का करा देता हूँ कल खोल लेना |
नहीं ,अभी मेरा अभिग्रह पूरा नहीं हुआ |
अच्छा  ,अगर पूरा न हो तो तेले (तीन दिन की तपस्या )के बाद खोल लेते हैं |(गुरूजी ने हिसाब लगाया और यह कहकर मुझे बहका दिया )
अच्छा ,खोल लो |पाप तो नहीं लगेगा |
नहीं नहीं ,कोई पाप नहीं |
ठीक है कहकर मैंने गुरु आज्ञा पालन मैं ही अपनी भलाई समझी |सेठजी जाने  ,उनका काम जाने|
बाद में , उनके यहाँ एक संत है सुन्दर मुनिजी |उन्होंने  ने हमारे पडोसी भैया से पूछकर अभिग्रह का राज  निकलवा लिया |वे खूब हँसे पर गुरुओं ने भावना के निर्दोषपन की बड़ाई भी मानी |   

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