शनिवार, 27 अगस्त 2016

ekks -10

जे डी की बात सुनकर मुझे रिअलाइज़ हुआ कि उस बिल्डिंग तक की गति सिर्फ यही नहीं थी कि मैने से -3 से ९७२ नंबर की बस पकड़ी और युनिवर्सिटी पहुंच गयी |
इस गति की तह में मेरे कई चुनावी विकल्पों की गतिरुद्धता थी |जे डी की बात सुनकर यह पिक्चर उस दिन मुझे
साफ साफ दिखाई दे गयी थी |
यह था जैन दर्शन में मेरा प्रवेश |
दीपाजी से पहचान हो गयी थी |उन्होंने कहा  राजस्थान की तरफ से उत्तराध्ययन की परीक्षा करा रहे हैं |मैंने भी भर दी |ओपन बुक एग्जाम था |एग्जाम के सिलसिले में कई बार उनके यहाँ जाना हुआ |उन्हें पढाने का बहुत  शौक था |परीक्षा हुई |मैं फोर्थ आई |
 उत्तराध्ययन की परीक्षा के वक्त ही कई बार दीपा जी के साथ रामप्रसाद जी म के पास जाना हुआ |संतों की चर्या होती है कि एक इलाके में आते हैं तो कई साल वहीँ आस पास लगा लेते हैं |वे वहीँ आस पास विचर रहे थे |गुरूजी हमें देख कर  ,खुश हो जाते थे |'हाँ !ये आई हैं तो जरुर कुछ न कुछ प्रश्न लायी है ' उन्हें पढ़ाने का बहुत  शौक था | वे स्वयं आगमों के प्रकांड विद्वान् और कई भाषाओँ के जानकार थे |परन्तु उनका विचरण क्षेत्र अधिकतर हरियाणा ,पंजाब ,दिल्ली था | पंजाब और दिल्ली तो फिर भी ठीक थे पर हरियाणा के गाँवों में उस समय साक्षरता भी नहीं थी |बेपढ़े लोगों के आगे एक विद्वान की विद्वत्ता का क्या मोल ?
समाज अपने गुरुओं से आशीर्वाद की अपेक्षा करता  है |आशीर्वाद दे दो |बस |गुरु का काम भी ख़त्म ,समाज भी मस्त |ज्ञान सीखने की न किसी में चाह है ,न कोशिश |खैर ....

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