एक दिन ख्याल आया गुरुओं को कुछ दान दूँ। उनके पास अपनी भावना रखी। सेठजी बोले ' कुछ नहीं चाहिए '.
हां ,इन्हें क्या आवश्यकता होगी। हज़ारों रुपयों की दवाइयां लोग इनके पैर सहलाकर दे जाते है। यह तो मैंने देखा ही था। पर अपने मन में उठ रही उमंग का क्या करूँ। इसे कैसे रोकूं ?(ये छोटे छोटे प्रसंग भक्ति नामक भावना के उत्ताल वेग को दिखाते है )
तो फिर भी ,मैंने 5 पैन (क्योंकि वे लोग ५ ही थे ) ख़रीदे और पहुंच गयी चरणों में।
राम प्रसाद जी बोले -सेठजी से पूछ ले। उनके पास यही ट्रिक थी मुझे टरकाने की। सेठजी का जवाब तो पहले से मालूम ही था। पर फिर भी दोबारा जाकर अर्ज़ की।
गुरूजी बोले -मुझे तो जरुरत नहीं। मैं तो कुछ लिखता नहीं कभी। (वे प्रवचनकार नहीं थे। प्रवचनकार संत डायरी बनाते है ,कविता ,गीत ,भजन ,शेर वगेरह नोट करते हैं। उन्हें पैनों की आवश्यकता पड़ती है )
गुरूजी ,रख लो प्लीज। मेरी भावना है।
वह तो ठीक है। पर मुझे जरुरत नहीं।
फिर भी मैंने ढीठता दिखाई और पैन उठाए नहीं। पर एक दो बार गुरूजी के कहने पर उठाने ही पड़े। कितनी अवज्ञा करती।
आते हुए फिर रामप्रसाद जी को फिर पूछा। वे स्वयं कोमल प्रकृति के संत थे। उनसे स्वयं ज्यादा ना -नुकुर नहीं होती थी। पर उन्हें अपनी चर्या भी तो देखनी थी। इसलिए वे दूसरे संतों पर बात को टाल देते थे। इस बार उन्होंने सुन्दर मुनि जी का नाम ले दिया।
बाप रे उनसे कौन पूछेगा ? आखिर वापस घर आ गयी।
उसी साल मुझे दीपा आंटी भी मिली थी। वे भी जैनिज़्म की अच्छी जानकार थी। उन्हें बात करने का शौक बहुत था। उनसे बात करना अच्छा लगता था |वे रामप्रसाद जी से कई प्रश्नों के समाधान पूछतीं ,साथ में मैं भी चिपक लेती थी ;यह देखना आँखों का ,मन का ,आत्मा का एक सुकून ही था कि दो ज्ञानी आपस में कैसे बात करते हैं ?उस आँखों से छलकते आनंद को शब्दों में बताया नहीं जा सकता |वहीँ जे डी भी बैठते थे |वे दीपा जी को देखकर मुस्कुराते थे ,दीपा जी उन्हें देखकर मुस्कुराती थी ,भगवन दोनों को देखकर मुस्कुराते थे ,मैं तीनो को मुस्कुराते देखकर मुस्कुराती थी |
उसी साल सुन्दर मुनि जी ने पोलियो का कैम्प भी लगवाया था |इस सिलसिले में भी दीपाजी से जान पहचान बढ़ गयी थी |कैम्प में वोलंटियर के काम में भी बहुत उत्साह दिखाया था |
हां ,इन्हें क्या आवश्यकता होगी। हज़ारों रुपयों की दवाइयां लोग इनके पैर सहलाकर दे जाते है। यह तो मैंने देखा ही था। पर अपने मन में उठ रही उमंग का क्या करूँ। इसे कैसे रोकूं ?(ये छोटे छोटे प्रसंग भक्ति नामक भावना के उत्ताल वेग को दिखाते है )
तो फिर भी ,मैंने 5 पैन (क्योंकि वे लोग ५ ही थे ) ख़रीदे और पहुंच गयी चरणों में।
राम प्रसाद जी बोले -सेठजी से पूछ ले। उनके पास यही ट्रिक थी मुझे टरकाने की। सेठजी का जवाब तो पहले से मालूम ही था। पर फिर भी दोबारा जाकर अर्ज़ की।
गुरूजी बोले -मुझे तो जरुरत नहीं। मैं तो कुछ लिखता नहीं कभी। (वे प्रवचनकार नहीं थे। प्रवचनकार संत डायरी बनाते है ,कविता ,गीत ,भजन ,शेर वगेरह नोट करते हैं। उन्हें पैनों की आवश्यकता पड़ती है )
गुरूजी ,रख लो प्लीज। मेरी भावना है।
वह तो ठीक है। पर मुझे जरुरत नहीं।
फिर भी मैंने ढीठता दिखाई और पैन उठाए नहीं। पर एक दो बार गुरूजी के कहने पर उठाने ही पड़े। कितनी अवज्ञा करती।
आते हुए फिर रामप्रसाद जी को फिर पूछा। वे स्वयं कोमल प्रकृति के संत थे। उनसे स्वयं ज्यादा ना -नुकुर नहीं होती थी। पर उन्हें अपनी चर्या भी तो देखनी थी। इसलिए वे दूसरे संतों पर बात को टाल देते थे। इस बार उन्होंने सुन्दर मुनि जी का नाम ले दिया।
बाप रे उनसे कौन पूछेगा ? आखिर वापस घर आ गयी।
उसी साल मुझे दीपा आंटी भी मिली थी। वे भी जैनिज़्म की अच्छी जानकार थी। उन्हें बात करने का शौक बहुत था। उनसे बात करना अच्छा लगता था |वे रामप्रसाद जी से कई प्रश्नों के समाधान पूछतीं ,साथ में मैं भी चिपक लेती थी ;यह देखना आँखों का ,मन का ,आत्मा का एक सुकून ही था कि दो ज्ञानी आपस में कैसे बात करते हैं ?उस आँखों से छलकते आनंद को शब्दों में बताया नहीं जा सकता |वहीँ जे डी भी बैठते थे |वे दीपा जी को देखकर मुस्कुराते थे ,दीपा जी उन्हें देखकर मुस्कुराती थी ,भगवन दोनों को देखकर मुस्कुराते थे ,मैं तीनो को मुस्कुराते देखकर मुस्कुराती थी |
उसी साल सुन्दर मुनि जी ने पोलियो का कैम्प भी लगवाया था |इस सिलसिले में भी दीपाजी से जान पहचान बढ़ गयी थी |कैम्प में वोलंटियर के काम में भी बहुत उत्साह दिखाया था |
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