सोमवार, 22 अगस्त 2016

ekks -8

ekks -7 एक रियलिटी चेक था ,पाठकों को पवित्रता के ओवरडोज़ से बचाने के लिए ;वर्ना 1997 में मेरी भावनाएं ,जैसा मैं लिख रही हूँ वैसी ही थी |मैं तो मौका देखती रहती थी गुरुओं के पास जाने का |
दिन में तीन बजे के लगभग मैं पाठ सीखने जाती थी | एक सामायिक जितने समय ,48 मिनट ,में मैं सेठजी के पास बैठती ,गुरूजी मुझे गाथा (श्लोक संस्कृत में कहते है |प्राकृत में गाथा होती है |उस दौरान मैंने वीर-स्तुति याद  की थी |यह जैन शास्त्रों के एक मूल शास्त्र का छटा अध्ययन है | )पढवा देते थे |मैं वहीँ बैठ याद करती थी |
इस दौरान ही मैंने सेठजी को ,उनकी दिनचर्या को इतने करीब से देखा था |वे एक लकड़ी के पाट पर बैठते थे |अधिकतर कोई किताब पढ़ते रहते थे ,या माला पिरोते थे ,या संतों के पीने के पानी की संभाल करते थे | किसी गर्म दिन में पानी को ठंडा करने के लिए भरे हुए पानी के पात्र में से एक साफ़ कपडे की पट्टी लटका दो ,पानी बहकर ,ठंडा होकर ,नीचे के पात्र में गिरता रहेगा  |या पानी से भरे पात्र को एक कपडा लगाकर दो ईटों या दो पात्रों के बीच में टिका  दो ,हवा लगकर पानी ठंडा होता रहेगा |सेठजी इन्ही कामों में लगे रहते थे |कभी अपनी चादर सील लेते थे |
इस तरह बैठे हुए ,भक्त आते ,उन्हें वंदन करते ;कोई कहते मांगलिक कृपा कर दो तो मांगलिक सुना देते थे |मांगलिक एक चार-पांच लाइनों का छोटा सा पाठ है जिसमे अरिहंत ,सिद्ध,साधू की शरण को मंगलकारी बताया गया है |कोई आते अपनी कोई परेशानी उन्हें बताकर पूछते ''यह काम होगा या नहीं ''| गुरूजी के मन में उस समय जैसा भाव उदय होता ,वे वैसा ही बता देते |भक्त संतुष्ट होकर चला जाता |फिर कोई आता ,वंदना करता ,कहता मांगलिक कृपा कर दो तो मांगलिक सुना देते थे |
कोई १५-२० दिन लगे होंगे मुझे वीर-स्तुति याद् करने में |इस बीच उनकी चर्या रोजाना ऐसी ही थी |पहले पहल तो मुझे इस चर्या से घबराहट सी हुई 'हाय हाय !क्या ये इन्सान नहीं ,जो हर कोई इस तरह इनके यहाँ सर उठाए चला आता है |क्या ये कभी इरिटेट नहीं होते ,कभी थकते नहीं ,कभी इनका जी नहीं उचटता इस जंजाल से कि छोड़ कर भाग जाऊं कहीं '
पर थैंक गॉड अपने मन के ये भाव मैंने मन में ही रखे ,कहे नहीं |मेरी हिम्मत ही नहीं हुई |
धीरे धीरे मुझे सेठजी में ,उनकी शांति में- संत का ,संतत्व का सार दिख गया |यह शान्ति ही तो संत है |यह शांति ऐसी थी जैसी हिमालय के पहाड़ों की या महासमुद्रों की  होती है -विराट  ,असीम ,गंभीर ,गहन ,ठोस ,अकंप |

   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें