अब तक मैने जो भी पढा है - शास्त्र और इतर किताबों में -उनका सार यह है- हिंसा और परिग्रह से विरति ।
विरति का अर्थ है -व्रत लेना ।
साधु -साध्वी सर्व विरत होते है ।उनके व्रत 3करण 3 योग से पाले जाते है ।
श्रावक -श्राविका देश विरत (कुछ अंश मे )होते है । उनके व्रत के 49 भंग है । भंग अर्थात विकल्प। वैसे तो जैनी भी ज्यादा नही जानते विकल्पों के बारे मे ,पर हिन्दी वाले सुनेंगे तो अवश्य गश खाकर गिर जाएंगे । उस पर फिर कभी ।
अब जैन धर्म मुख्यतः बनिया में है ।इनका हिंसा का तो काम नही पडता , परिग्रह का ये पालन नही करते 😊
परिग्रह का नाम लेते ही आप के मन मे यह आएगा कि साल मे चार साडी । बट ! यह भी आपके माइंड की एक सेट सोच है ।
मैने परिग्रह की व्याख्या यूं की है कि कमाने की क्षमता मे से मर्यादित धन निकाल कर बाकी का त्याग करना ।
संसार अवस्था में , इस विरति मे ही संसार की सारी शक्तियां है । इस सोच मे मेरी बुद्धि स्थिर है।
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