महावीर वाणी :यात्रा और अन्तर्यात्रा की यात्रा को मै आत्मज्ञान के मार्ग पर एक स्त्री की यात्रा के रूप मे देखती हूं। जिसमे यात्री उस तरह सजग भी नही है ,वह तो यह भी नही जानती कि वह किसी यात्रा पर है ;वह तो चल रही थी ,एक बेहद मामूली आम सा जीवन जीते हुए कि उस पर यात्रा का वैभव अपने आप प्रकट हो गया और वह सुखद आश्चर्य मे भरी ,दंग खड़ी रह गई।
अपने जाने मै उत्तराध्ययन से आगे दूसरा ,दूसरे के बाद तीसरा शास्त्र पढ़ रही थी । ....मै समझती हूं मजूमदार की किताब मे दारा शिकोह की दार्शनिकता , उसकी जिज्ञासाएं , अपने समकालीन संतो से उसका पत्र व्यवहार और उसकी ईमानदार कोशिशों के बारे मे पढ़कर- बड़े गहरे तौर पर मुझे यह भान हुआ कि इस क्षेत्र के आसपास मनुष्य के अस्तित्व संबंधी बेहद गंभीर प्रश्नो की सच्चाइयां है ।पाठक यह भी ध्यान रखे कि यह किताब एक इतिहास की किताब है ।
एक मात्र अपने गुरु और परिचित संतो के स्नेह के बल पर यह संभव हुआ कि मै आगे से आगे शास्त्र पढ़ती चली गई और मुझे कभी भय नही हुआ।जैसे एक बच्चा पिता की उंगली थामकर पूर्ण निश्चिंतता के साथ मेले की अजीबोगरीब चीजे देख आता है ।वह भयभीत नही होता ।
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एक बार मुझे किसी ने कहा था कि इसमे 'करियर'बनाने का अच्छा स्कोप है ।
बिल्कुल नही।
मुझे भी जो मिला है फ्री मिला है । यह सब पढकर जो भी जो कुछ पावे , वह उसी का है ।
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आत्मज्ञान और सांसारिक ज्ञान मे मै यह मेल देखती हूं कि सांसारिक ज्ञान भी आत्मज्ञान की आभा मे विलक्षण हो जाता है ।
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बौद्धिकों मे ओशो और कृष्णमूर्ति अधिक प्रचलित है ।
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