यह कई साल पुरानी पोस्ट है ।इसमे जिस बात का जिक्र है वह तो और भी पुरानी है ।
यह उस वक्त की बात है जब मैने गुरूधारणा ली थी । गुरुधारणा के बदले मै हर साल गुरूदेव के दर्शन करूं,इतने बंधन से भी उन्होने मुक्त रखा था ।
यह हमारा शास्त्र लिखित-अनुमोदित आचरण है । भोजन तो मानव शरीर को चलाने के लिए कितना आवश्यक है ।उसके लिए भी इस आदर्श से समझौता न करे ,शास्त्रों मे यही कथन जगह जगह ,हर जगह कहे गए हैं ।एक विशुद्धतम आदर्श।
जमीन पर कीचड़ मे धंसे नश्वरों के लिए मनमोहक चंद्रमा जैसा निर्मल ।
मै जानती हूं वास्तविक स्थिति ऐसी नही है ।मै अनभिज्ञ नही हूं ।
ना उस वक्त थी ।
"तुम कौन कहीं की लेफ्टिनेंट गवर्नर लग रही हो , जो कोई तुम्हे पूछेगा "। मेरे आत्म-आलोचनात्मक सेल्फ ने कहा था ।
यह बात अभिमान को बहुत चुभने वाली थी ।पाठक जानते है यह आत्म-आलोचनात्मक सेल्फ अकेले तो आती नही है ।साथ मे अपने से भी तेज-तर्रार,मुँह मे छुरी जैसी जबान वाली संगी-साथी ले कर आती है ।
" सचमुच मनुष्य होने पे धिक्कार है गर किसी की इतनी भी पूछ न हो ।इससे तो मौत भली ।" सहेलियों ने छुरियां चलाकर अभिमान को छलनी कर दिया ।
.
उस वक्त इससे जूझने का क्या उपाय था ।कुछ भी नही । एक सामान्य व्यक्ति को यह पता नही होता कि वह अपने सामान्य होने को किस प्रकार लांघे ।
वह तो इससे जूझता हुआ चल ही सकता है ।
खैर
बाद मे जब मैने स्वयं शास्त्र पढे ,तब इस शास्त्र लिखित-अनुमोदित चन्द्रमा रुपी आचरण के दर्शन किए ।
अंय...
हे प्रभू ! हम कितने महान उहापोहों मे जीते हैं ।
अपने गुरुदेवों के अंतर्विरोधों पर मुझे कभी शंका नही हुई। हम जिन्हे व्यक्ति के अंतर्विरोध कहते है ,वे इस समय के अंतर्विरोध है जिसमे हम रह रहे है । उनका जूझना भी मैने देखा है ।
बंधन से मुक्ति ,यही उनका आदर्श था । बहता पानी , हवा , आकाश की निरालम्बता -साधु जीवन के लिए ये उपमाएं कही जाती है । वे अधिकतम साधु मर्यादा के इसी आदर्श पे जिए ।
17 Aug 2016
जैन दर्शन की कहानी के साथ गुरूजी की कहानी भी आ गयी है।
चातुर्मास पूरा होते होते मुझ पर गुरूजी का रंग चढ़ने लगा था। नित नए ख्याल आते थे।
एक दिन ख्याल आया की मुझे गुरु धारणा लेनी चाहिए। सब लेते हैं। तो पहुंच गयी सेठजी के पास।
पर ये क्या। येल्लो ,हो गया बिस्मिल्ला ही गलत !
सेठजी बोले मैं तो किसी को गुरु धारणा देता नहीं।
अयं ,हमने तो गुरुधारणा दिलाने के लिए संतो को लोगों के पीछे पड़ते देखा है। ये कैसे गुरु हैं ?
खैर !मन मार के राम प्रसाद जी के पास गयी। वे बोले ' अरे मैं कहाँ ?ये तो सेठों के काम हैं। मैं तो छोटा मोटा आदमी हूँ ?' सुनकर बड़ी हंसी आयी। हाँ मोटे तो आप हैं ही।
फिर सेठजी के पास गयी। उन्होंने फिर न कह दिया।
फिर राम प्रसाद जी के पास आयी। उन्होंने कहा मेरा नाम ले दियो ,दे देंगे।
फिर सेठजी के पास गयी। फिर ना हो गयी। इसी तरह यह खेल १५-२० मिनिट तक चलता रहा। आखिर राम प्रसाद जी का दिल पसीजा की क्यों बच्ची के चक्कर लगवाए।
तो पूछा -क्यों लेना चाहती हो ?
जी ,सब लेते है।इसलिए |
इससे पहले किसी की ली है।
नहीं
अच्छा कहकर समकित का पाठ सुना दिया। हो गयी गुरु धारणा।
हो गयी जी ?
हाँ
बस यही होती है ?
हाँ ,एक बात का ध्यान रखना। जीवन में कभी आत्महत्या नहीं करनी। (हैं जी ,मैं डर गयी। कहीं गुरूजी को कुछ भविष्य तो नहीं दिख गया | यह तथ्य संत वचनों का आम जन मानस पर प्रभाव को बताता है |खैर )
क्यों जी ,ऐसा क्यों कह रह हो आप ?
कुछ नहीं गुरुधारना देते हुए हम यह नियम सभी को कराते हैं |(सुनकर जान में जान आई ) अगर जीवन में कभी ऐसा मौका आये तो यह कदम नहीं उठाना ,पहले हमारे पास आना है |
जी
नियम करा दूँ
करा दो जी |जी मैंने सुना है साल में एक बार अपने गुरु के दर्शन जरुर करने पड़ते है |(भाषा देखिये ,कैसा बोझ भरा है इन शब्दों में )
हाँ ,कई लोग कराते है यह नियम ,पर मैं नहीं कराता |मैं किसी को बांधता नहीं |
सुनकर गुरु की उस अकिंचन छवि से मन अपने आप बंध गया | मुझे संतुष्टि नहीं हो रही थी |जन्म -जन्मान्तरों को बदल देने वाली अलौकिक घटना इतनी छोटी सी कैसे थी ?मैं कुछ और भी करना चाहती थी |कुछ बड़ा ,कुछ महान |
मैंने अर्ज की 'जी और कोई नियम भी करा दीजिये '
ले ले जो तेरा मन हो |
कुछ ज्ञान तो था नहीं |सो आजीवन अरवी की सब्जी का त्याग कर लिया |
चातुर्मास पूरा होते होते मुझ पर गुरूजी का रंग चढ़ने लगा था। नित नए ख्याल आते थे।
एक दिन ख्याल आया की मुझे गुरु धारणा लेनी चाहिए। सब लेते हैं। तो पहुंच गयी सेठजी के पास।
पर ये क्या। येल्लो ,हो गया बिस्मिल्ला ही गलत !
सेठजी बोले मैं तो किसी को गुरु धारणा देता नहीं।
अयं ,हमने तो गुरुधारणा दिलाने के लिए संतो को लोगों के पीछे पड़ते देखा है। ये कैसे गुरु हैं ?
खैर !मन मार के राम प्रसाद जी के पास गयी। वे बोले ' अरे मैं कहाँ ?ये तो सेठों के काम हैं। मैं तो छोटा मोटा आदमी हूँ ?' सुनकर बड़ी हंसी आयी। हाँ मोटे तो आप हैं ही।
फिर सेठजी के पास गयी। उन्होंने फिर न कह दिया।
फिर राम प्रसाद जी के पास आयी। उन्होंने कहा मेरा नाम ले दियो ,दे देंगे।
फिर सेठजी के पास गयी। फिर ना हो गयी। इसी तरह यह खेल १५-२० मिनिट तक चलता रहा। आखिर राम प्रसाद जी का दिल पसीजा की क्यों बच्ची के चक्कर लगवाए।
तो पूछा -क्यों लेना चाहती हो ?
जी ,सब लेते है।इसलिए |
इससे पहले किसी की ली है।
नहीं
अच्छा कहकर समकित का पाठ सुना दिया। हो गयी गुरु धारणा।
हो गयी जी ?
हाँ
बस यही होती है ?
हाँ ,एक बात का ध्यान रखना। जीवन में कभी आत्महत्या नहीं करनी। (हैं जी ,मैं डर गयी। कहीं गुरूजी को कुछ भविष्य तो नहीं दिख गया | यह तथ्य संत वचनों का आम जन मानस पर प्रभाव को बताता है |खैर )
क्यों जी ,ऐसा क्यों कह रह हो आप ?
कुछ नहीं गुरुधारना देते हुए हम यह नियम सभी को कराते हैं |(सुनकर जान में जान आई ) अगर जीवन में कभी ऐसा मौका आये तो यह कदम नहीं उठाना ,पहले हमारे पास आना है |
जी
नियम करा दूँ
करा दो जी |जी मैंने सुना है साल में एक बार अपने गुरु के दर्शन जरुर करने पड़ते है |(भाषा देखिये ,कैसा बोझ भरा है इन शब्दों में )
हाँ ,कई लोग कराते है यह नियम ,पर मैं नहीं कराता |मैं किसी को बांधता नहीं |
सुनकर गुरु की उस अकिंचन छवि से मन अपने आप बंध गया | मुझे संतुष्टि नहीं हो रही थी |जन्म -जन्मान्तरों को बदल देने वाली अलौकिक घटना इतनी छोटी सी कैसे थी ?मैं कुछ और भी करना चाहती थी |कुछ बड़ा ,कुछ महान |
मैंने अर्ज की 'जी और कोई नियम भी करा दीजिये '
ले ले जो तेरा मन हो |
कुछ ज्ञान तो था नहीं |सो आजीवन अरवी की सब्जी का त्याग कर लिया |
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