शनिवार, 7 जनवरी 2023

साहित्य शिक्षण : एक शब्द के पीछे भागता मन

सआदत हसन मंटो की एक कहानी में एक शब्द पढ़ा था -खलूस । मुख्य पात्र अपने खुद के बेटे को कह रही है- सूअर के बच्चे और सामने बैठा पति हंस रहा है । क्योंकि ,  कहानीकार ने खुलासा किया कि यह उसने ऐसे खलूस से कहा कि उसके मन में क्रोध उत्पन्न होने की बजाय गुदगुदी हुई। 

मुझे यह भाव समझ नहीं आया ।क्या होता होगा-  खलूस से कहना । फिर कई साल बाद मैंने यही बात संजू फिल्म मे देखी । नरगिस दत्त बनी मनीषा कोइराला संजू को -सूअर के बच्चे- कह रही है और सुनील दत्त बने परेश रावल हँस रहे है ।तब इस शब्द का अर्थ कुछ समझ में आया ।

स्त्री काबिलियत और क्षमता में पुरुष के बराबर की है । यह उसकी ताकत है कि पुरुष के सामने उसके पुत्र को कह सकती है सूअर का बच्चा ।लेकिन इस ताकत में अहंकार नहीं है (अगर है भी तो मीठे किस्म का |) बल्कि स्त्री और पुरुष होने की विभिन्नता के प्रति स्वभाविक विनय है। इसलिए उसके कहने में तिरस्कार की चोट नहीं है ,स्नेह घुला हुआ है ।

 क्या यह उच्च वर्ग के स्त्री-पुरुष की बात है । नहीं , यह स्त्री पुरुष के बीच प्रेम की बात है । वर्ग कोई भी हो ।जब स्त्री अपने प्रति पुरुष के प्रेम में आश्वस्त होती है तब यह खलूस उसके व्यवहार में अपने आप प्रकट होता है ।

आश्वस्ति का यह भाव प्रेम के अन्य रूपों की गहराई में भी दिखता है। भीष्म साहनी की एक कहानी है 'ओ हरामजादे !'। मुख्य पात्र लंदन जाकर अपने परिवार के साथ हुए वहां के नियम -कायदों वाली यंत्रवत्त जिंदगी जी रहा है।  ऊपरी तौर पर एक सभ्य,शालीन, सुविधापूर्ण जिंदगी जीते हुए भी वह पंजाब के पिंड की जिंदगी को भूल नहीं पाता ,जहां जान पहचान के लोगों के बीच कभी कोई भी पीछे से आवाज लगाकर टोक देता था 'ओ हरामजादे !उसकी आत्मा वैसी सहज आत्मीयता को तरस जाती है।

Ps : हाँ ।ठीक है । मैने भी यही सोचा था कि जिस तरह से बाकी लोग प्रेम मे हमसे आ जुड़े है ,इसे बहुमान न देना उनकी प्रतिभा और प्राज्ञता का अनादर होगा । 

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