भारत जोड़ो यात्रा सचेत चिन्तन के लिए जरूरी बहुत से मुद्दों पर विचार,पुनर्विचार के रास्ते खोलती है ।जिन्हें मैंने अपनी समझ और सामर्थ्य के अनुसार इस पोस्ट में लिखा है ।
> पोस्ट की शुरुआत उसी दुष्ट "मैं" के अनुभवों से शुरू होती है जिसे ऑब्जेक्टिव थिंकिंग की राह में सबसे बड़ा अवरोधक माना गया है । मैं समझती हूं हमारी चेतना विस्तार के अनुभव को प्राप्त करने से पहले इसी संकडे मैं में से गुजरती है ।
> चिंतन के क्रम में आए आवश्यक संकेत शब्द का उल्लेख पैरा की शुरुआत में कर दिया गया है ।
धर्म ,गुरु परंपरा , श्रद्धा -अश्रद्धा - परंपरा से हम लोग श्वेतांबर स्थानकवासी जैन परंपरा के अनुयाई हैं । मुख्य रूप से ये सफेद मुख-वस्त्रिका( 8×6 अंगुल)सफेद वस्त्र पहने संत सतियों के प्रति श्रद्धालु होते हैं |साल में एक बार अपने धर्म स्थान पर चातुर्मास कराते हैं| बाकी साल संत -सतियाँ विहार करते हैं |गुरु दर्शन करना ,प्रवचन सुनना, स्वयं मुख वस्त्रिका लगाकर सामायिक करना ,व्रत करना -इनके धार्मिक कर्तव्य में आते हैं |यह परंपरा 22 टोले के नाम से भी जानी जाती है |
मुख्यतः गुरु परंपरा आधारित होने के कारण श्रद्धालु धर्म का जो स्वरूप सुनते हैं वह दरअसल आलोचना की भी आलोचनात्मक व्याख्या होता है |यह परंपरा ढाई हजार साल से चली आ रही है तो सोचिए कि इस परंपरा में चिंतन का कितना नवनीत इकट्ठा होगा और कितना नि:सार तत्व खत्म हो गया होगा| मुख्य बातें वही है जो शास्त्रों में बताई गई हैं पर उनकी व्याख्या अलग-अलग होती है |इसी के अनुरूप आचार व्यवस्था में भी ढील या सख्ती के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं |एक इलाके की संत परंपरा के संत बहुत क्रियावादी, दूसरे इलाके के संत ढीले - इस तरह यह खींचतान चलती है |इनमें काव्यात्मक पेंच भी देखने को मिलते हैं | "आलू पर तो बड़े दयालु इंसानों की खैर नहीं " यह पंक्ति उन पर कटाक्ष है जो आलू प्याज की हिंसा पर ज्यादा जोर देते हैं |
इस तरह की हाई क्वालिटी बौद्धिक गतिविधि मुख्यतः संत समाज की धरोहर है | आम श्रद्धालुओं का इससे ज्यादा सरोकार नहीं होता |इसी के साथ बीच में लो क्वालिटी बुद्धि के नमूने भी घूमते रहते हैं |आम श्रद्धालुओं को उनसे भी ज्यादा सरोकार नहीं होता | पर इन नमूनों की निंदा रस में पगी हुई व्याख्याये घरों में चलती रहती है | कुल मिलाकर यह एक सेचूरेशन पॉइंट की स्थिति है जिसमें टॉप मोस्ट फ्लोर में तो कोई जाता नहीं | सब नीचे के फ्लोर की हलचल में रहते हैं |ऊपर से श्रद्धालु का चोला ओढ़े हुए भी भीतर की अश्रद्धा के कारण से उदासीन बने हुए यंत्रवत सब होता चले चलता है | अश्रद्धा से घायल आत्मा को और अधिक खुजलाने का काम करते हैं संतो के भी आपसी अहंकार | समवेत रूप में यह धर्म की हानि ही करते हैं |
एक बाग का क्षति ग्रस्त होना और दो तितलियों का अलग-अलग फूलों पर बैठना - 1996 में मैं जब गुरुओं से जुड़ी उस वर्ष वे अपने संघाटक (ग्रुप) से अलग हुए थे | यह उनके लिए बहुत मुश्किल समय था |बड़े गुरुदेव अपने हाथों लगाए बाग को क्षतिग्रस्त होता देख रहे थे | वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे |यह स्वयं अपने आप में एक इतिहास है | मैं इसमें नहीं जाऊंगी |
मैंने और मेरे भाई ने उसी साल जाना शुरू किया था|| चांस की बात थी कि मेरा सेठ जी महाराज संघाटक के संतो से लगाव हुआ |वह आगे चलकर दूसरे ग्रुप के संतों से जुड़ा है | पूर्व मे ये एक ही गुरु के शिष्य हैं |अब इनमे कुछ विरोध है | विरोध के कारण भी बड़े गहरे और सच्चे हैं |
तो इस तरह गुरुओं के आपसी विरोध का मसला भी हम दो भाई- बहन में आपसी बहस का मुद्दा बनता रहा |वह अपने तर्क देता |मैं अपने तर्क देती |मानना तो किसी ने था नहीं |पर दूसरों को अर्थात घर के बाकी सदस्यों को गॉसिप का मसाला जरूर मिल जाता था|
करीब 13- 14 साल यह सब इसी तरह चलता रहा |आरंभ में इसमें लड़कपन की खींचतान थी |धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि ये मुद्दे सीरियस हैं | गॉसिप के विषय नहीं हैं | फिर मैं इन मुद्दों से बचने लगी |मिले हैं तो जरूरी तो नहीं कि विवाद के मुद्दे उठाए जाएं | जिन पर सहमति है उन पर बात कर लो |
अकेले में मैं सोचती "देखो !हम दोनों भाई बहनों में कितना प्यार था / है |पर धर्म ने हमें अलग कर दिया |रागात्मक जुड़ाव का यह पक्ष मेरे लिए हमेशा रहस्यमय ही रहा |
सारी कहानी रागात्मक जुड़ाव की है | गृहस्थ तो दूर इसके प्रभाव से संत भी नहीं बच पाते हैं | अलगाव के बाद बड़े गुरुदेव भी दुखी होकर प्रवचन में कहते थे "ना लगाव होता ना अलगाव होता |" हम दोनों भाई -बहन धार्मिक जुड़ाव के दुष्प्रभाव से यूं बच गए कि एक तो हमारा पर्सनल बांड अच्छा था | दूसरे श्रद्धालु के रूप में हम हमेशा सामान्य श्रद्धालु बने रहे |संतो के प्रति राग में हमने धर्म की सामान्य व्याख्या की सीमा रेखा को कभी नहीं लांघा | श्रद्धालु के तौर पर आचरण का जो सामान्य स्वरूप हमारे यहां प्रचलित है हम उसी तक सीमित रहे |उससे आगे नहीं गए |बाद में हम इस प्रसंग की कलुषता से दूर ही हो गए |अब शांति हैं | हम समझ गए हैं कि यह उनका आपसी मामला है| वे स्वयं समर्थ हैं |स्वयं समझ लेंगे |
जैसा मैंने देखा है मैं यह समझती हूं कि धार्मिक मतभेदों के कारण बड़े गहरे और सच्चे होते हैं |इसके उदाहरण एक परंपरा, एक गुरु परंपरा ,एक गुरु के शिष्यों में हैं तो अलग-अलग धर्मों की विभिनता के कारण तो निश्चित ही मजबूत होंगे |वहां तो दार्शनिक चिंतन के मतभेद होते हैं |एक ईश्वर वादी श्रद्धालु दूसरे अनीशवरवादी श्रद्धालुओं से सहमत कैसे होगा ?
लेकिन मैंने एक सच और भी देखा है | धार्मिक विभिनता के भेद का स्वरूप जो एक लेवल पर बिल्कुल सही और सच्चा प्रतीत होता है ,एक भावभूमि पर आकर यह भेद बिल्कुल तिरोहित हो जाता हैं | ऐसे जैसे सारा झगड़ा नीचे के फ्लोरो का है | ऊपर पहुंचकर सब शांत हो जाता है | मैंने यह सच भी देखा है |
धर्म के विभिन्न रूप : मेरे पारिवारिक संदर्भ - मैंने मेरी दादी में धर्म का विह्वल रूप देखा था | पाठक जानते हैं कि बच्चों को दादी कब मिलती है | जब वह 60 -70 साल का जीवन जी चुकी होती है | वह जिंदगी के सारे वसंत और पतझड़ , खुशी और गम देख चुकी होती है | जिंदगी की हलचलो से स्थिर चित्त , उसकी गहराई से निष्कम्प |
जैन आगम ' उववाई ' मे नगरी के बाहर स्थित एक देवालय का वर्णन आया है | नगरी ,नगरी के बाहर उद्यान, देवालय ,वन होना - यह प्राचीन भारत की नगर रचना के अंग है | उस देवालय की विशेषताओं का वर्णन आया है - वह स्थान झंडों से सुसज्जित था, दीवारों पर हाथ की छापे लगे थे , वह अगर के धुए से गमगमाता था इत्यादि | इन विशेषताओं में एक शब्द आया है - आह्वानीय , आह्वान करने योग्य |संकट की घड़ी में पुकारे जाने योग्य |
उववाई सूत्र मे इस देवालय का वर्णन पढ़कर और इस शब्द को पढ़कर मुझे मेरी दादी के धर्म का स्वरूप बिल्कुल क्लियर हो गया | मैं कहूंगी यह बात वाइस वर्सा ,उलट रूप में भी उतनी ही सच है |दादी का जीवन देखकर मुझे यह वर्णन एकदम क्लियर हो गया |
अपनी दादी को तो मैंने बचपन से देखा ही था |वह गांव की महिला थी | वह मेरे लिए एकमात्र उदाहरण थी उन लोगों की पहचान का जिनके लिए हम कह सकते हैं -जगह से बंधे हुए लोग |वह अपने गांव (ससुराल- गढ़ी झझारा) से बंधी थी |जबकि वह कब का छूट गया था |बहुत साल ये लोग गनौर में रहे| फिर दिल्ली में रहने लगे पर उसका मन वही गांव में रहा -अंत समय तक |
गढ़ी झझारा गांव के बाहर एक पीर बाबा की मजार है | खेतों के बीच में है | एक छोटी सी जगह है |एक मुस्लिम परिवार उसका रखरखाव करता है ,चढ़ावा लेता है | अब तो उस गांव में बहुत से मुसलमान आ बसे हैं | उन्होंने उस मजार को हरे कपड़े और हरे झंडों से सजाकर 'अपना ' रूप दे दिया है |
पहले वह सादा जगह थी |उस पर नीला कपड़ा ढका रहता था | हम भी गए हैं बहुत बार |गांव के सभी लोग होली दिवाली या बोला कबूला, मन्नतें पूरी होने पर जाते थे | उस जगह से मेरी दादी का भावनात्मक जुड़ाव था | यूं वह सामायिक करना भी जानती थी |नवकार मंत्र भी आता था | पर उसका मन उस जगह से जुड़ा था | परिवार में कोई भी संकट उपस्थित होने पर वह घबरा जाती , गला रूंध जाता और 'पीर बाबा सब ठीक कर देगा 'यह कहने लगती | आह्वानीय शब्द का अर्थ मुझे इस तरह क्लियर हुआ |मैंने यह देखा था |
यह जो धर्म का स्वरूप है इसे आस्था का विह्वल रूप कह सकते हैं | इसमें ज्ञान नहीं है। बस भावना का जुड़ाव है | मेरी दादी सरल स्वभाव की ,परिवार -समाज में औरतों की बेदखली को सहती हुई , एक कमजोर- अनपढ़ -बाहरी दुनिया से अनुभवहीन ( लेकिन आंतरिक रूप से मजबूत ) औरत थी |ऐसे लोग जीवन मे जो कुछ भी बेदखली सहते है तो वे अंतिम शरण के रूप मे धर्म के जिस भी रूप से जुडते हैं तो यह जुड़ाव उनके लिए अनक्वेश्चनेबल होता है | वे किसी की नहीं सुनते हैं |पढ़े लिखो में यह जो कहा जाता है कि आस्था अंधी होती है वह इन्हीं लोगों की धार्मिक श्रद्धा के लिए कहा जाता है |वह सरासर गलत भी नहीं है |
धर्म का सामान्य रूप मैंने अपने मम्मी -पापा में देखा | इसे धर्म का बहुतायत रूप भी कह सकते हैं | आज के युग में अधिकांश जन इसी को फॉलो करते हैं | अपनी अपनी पद्धति के हिसाब से पूजा कर ली और अपने घर के जीवन में मस्त रहे | ना धर्म से ज्यादा अपेक्षा ना संसार से | बस यूं ही चलते चले गए |धर्म के इस रूप में भी कई वैरायटी संभव हैं |यह व्यक्ति के स्वयं के स्वभाव पर निर्भर है |
पैरा दो में मैंने यह कहा कि अलग-अलग गुरुओं के प्रति राग का जुड़ाव भी हम भाई-बहन में वैमनस्य का कारण नहीं बना | इसका कारण यही था कि परंपरागत रूप से हमने अपने घर में धर्म का सामान्य रूप देखा था | किसी एक गुरु के पीछे लग कर बाकी संत सतियों की उपेक्षा करना ,अपने क्षेत्र में आए संत की उपेक्षा करके दूर क्षेत्र में रहे हुए के पीछे भागना -यह भी गुरु परंपरा का आलोच्य विषय है | संत- सतियां इस विषय पर बोलते रहते हैं | मेरे विचार के अनुसार धर्म का सामान्य रूप जीवन के अंत तक सामान्य /कमजोर ही रहता है। उसमें कभी इतनी शक्ति नहीं आ पाती कि वह जीवन को बदल सके |
हमारे मम्मी पापा इस विषय में किसी गुरु विशेष के विशेष राग से दूर रहे | हम दोनों भाई बहन विशेष राग में पड़कर भी उसके कर्दम से दूर रहे ,निर्मलता में ही रहे | पाठक देखें ! यह होती है एक जीवंत आलोचना परंपरा की शक्ति | एक तेज प्रवाह नदी की तरह इसमें खुद अपनी गंदगी साफ करने की कितनी महान शक्ति होती है |
धर्म के विभिन्न रूप : अन्य संदर्भ - धर्म संबंधी अपनी मान्यताओं और विचारों को प्रकट करते हुए एक बात की वास्तविकता कि मैं अनदेखी नहीं कर पाती |वह बात है कि जैनेत्तर लोग इन विचारों को किस तरह समझेंगे |
मुझे उनकी चिंता नहीं जो इन विचारों को जैन लेबल लगाकर खारिज करना चाहें | कर दें | मुझे उनके आगे कुछ प्रूव नहीं करना |मुझे उनकी चिंता अवश्य है जो सचमुच सत्य के जिज्ञासु ,सदिच्छा से भरे है| इसमें मैं हिंदू धर्म संबंधी कुछ संदर्भों का उल्लेख कर रही हूं |
हजारी प्रसाद द्विवेदी का चिंतन - हिंदुओं में पूजा का स्वरूप व्यक्तिवादी है |समूह में आरती ,कीर्तन करते हुए भी एक साथ बोलने या ताली बजाने की बाध्यता नहीं है |बीच में जुड़ सकते हैं , छोड़कर भी जा सकते हैं,| ऐसा ही हमने हमारे यहां प्रवचनों में देखा है |मुस्लिमों में वे एक साथ प्रार्थना भी करते हैं , अलग-अलग भी करते हैं |समूह में वे एक साथ झुकते हैं एक साथ खड़े होते हैं | एकांत में भी अकेले कर लेते हैं|
सुधीश पचौरी कृत उपन्यास ' मिस काऊ ए लव स्टोरी ' | यह एक उपन्यास है |फिक्शन है |यह उपन्यास हाइपर रियलिटी और रियल्टी के बीच फंसे हुए एक बुद्धिजीवी के संत्रास की कहानी है |खासा पेचीदा उपन्यास है |बिल्कुल भी मनोरंजक नहीं है |सच कहूं तो यह उपन्यास पढ़कर खुद मुझे ही दहशत सी हो गई | फिर मैंने इस बात को इस तरह समझा कि मैंने तो सिर्फ पढ़ा है तभी मुझे इतनी दहशत है और जिसने लिखा है तो उसने कितनी दहशत का सामना किया होगा |
इस तरह 2008-9 तक धर्म के प्रति मेरा यह विचार पुष्ट हो गया था कि धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है।
अपने धर्म संबंधी चिंतन और अनुभवों के कारण में सैद्धांतिक रूप से धर्म की राजनीति के खिलाफ थी |पाठक जानते हैं सैद्धांतिक रुप से किसी बात के पक्ष या विपक्ष में होने का स्वरूप बहुत सख्त , अड़ियल किस्म का होता है | इसमें किंतु परंतु की गुंजाइश नहीं होती |जरा सी ढील ढुलमुलपन की निशानी मानी जाती है | उन्हें बिना रीढ़ का इत्यादि कहकर तिरस्कृत किया जाता है|
राजनीति ,शास्त्रों का अध्ययन , धर्म की राजनीति : उस समय तक राजनीति मेरे सचेत चिंतन का विषय नहीं थी | हम मात्र ट्रेडिशनल वोटर थे | पीहर में कांग्रेसी, ससुराल में अलग पार्टी । राजनीति मेरे सचेत दर्शन (अर्थात मीडिया के माध्यम से जो दिखने में आता है उस पर मैं ध्यान देने लगी |पहले तो वह ख्याल भी नहीं था |)का विषय 2012-13 के बाद ही बनी | कौन क्या कह रहा है |किस तरह की बातें हैं |
मेरा शास्त्र पढ़ना भी चल रहा था |शास्त्र पढ़ने से यह हुआ कि मुझे अपने धर्म की लिखित बातों को जानने का अवसर मिला | लिखित रूप में पढ़ने से धर्म संबंधी चिंतन दिमाग में ठहरता भी है | खाली सुनने से तो कभी किसी विषय को सुना तो कभी किसी को ; वह भी नियमित नहीं | फिर सभी संत एक जैसे ज्ञान दक्ष भी नहीं होते | सब कुछ बिखरा हुआ रहता है |कोई तारतम्यता नहीं बनती | इंसान जीवन भर कोरा का कोरा ही रह जाता है |
शास्त्र पढ़ने से मेरा स्वयं का धर्म संबंधी चिंतन भी बनना शुरू हुआ | इससे मेरी समझ और साफ हुई |2019 के आसपास तक हिंदू धर्म और जैन धर्म की यही विभिनता मुझे समझ में आती थी कि ये लोग स्नान में धर्म मानते हैं | हम अपकाय की हिंसा को मानते हैं |एक विभिनता और भी है जो बाद में मैंने सूत्रकृतांग में पढ़ी | वह है - अग्नि | हिंदू धर्म में अग्नि को पवित्र मानते हैं |हम तेउ काय की हिंसा को हिंसा मानते हैं |
इन दो धर्मों की मूलभूत विभिन्नता यही है | बाकी तीज त्योहार ,व्रत, उपवास ,सूतक ,पातक, श्राद्ध ,अमावस्या पूजन होली पूजन, हवन वगैरा हमारे यहां भी यथावत है |गृहस्थ के तौर पर ज्यादा फर्क नहीं है |
एक तटस्थ व्यक्ति के रूप में धर्म की राजनीति देखने के बाद सैद्धांतिक रूप से इसके विरोध में होते हुए भी, एक बड़ी जनसंख्या को इसकी प्रभावित करने की क्षमता को खारिज नहीं कर सकते |जो भी है ,जैसी भी है -यह हमारे समय की सच्चाई है |इस तरह 2009 के मेरे दृष्टिकोण की कठोरता में यह बदलाव हुआ और मैं एक तटस्थ व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण से इस राजनीति को देखने लगी |
राज्य और धर्म राज्य व्यवस्था का मूल लक्ष्य एक क्षेत्र विशेष के लोगों को शांति पूर्वक जीवन यापन करने के लिए नियम ,शासन में चलाना,है | प्रत्यक्षतः इसका कोई धर्म नहीं होता |
धर्म सत्य की खोज का मार्ग है | ऐसे उदाहरण हैं कि महात्मा बुद्ध और महावीर जी अपने-अपने राज्यों के राजकुमार पद को छोड़ कर गए थे और सत्य की खोज की थी| हिंदू धर्म में विश्वामित्र आदि राजर्षि हुए हैं |
प्रत्यक्षतः इन में कोई संबंध नहीं है | एक त्याग का मार्ग है | एक भोग का मार्ग है |एक संसार को छोड़ने का मार्ग है| एक संसार को उत्कृष्ट संसाधनों के साथ "राज "करने/ भोगने का मार्ग है |सचमुच क्या साम्यता हो सकती है दोनों में | कुछ भी नहीं |
पर यह सच नहीं है |इन दोनों मार्गों में प्रत्यक्षतः कोई समानता ना होने पर भी परोक्षतः इनका संबंध आपस में इतना गुढ़ा और गाढ़ा रहा है रहा है कि ना केवल यह अटूट है , सुदूर प्राचीनतम काल से चला आ रहा है बल्कि राज्य व्यवस्थाएं ( राजतंत्र व्यवस्था में ) धर्म सत्ता के आगे कहीं आक्रांत तो कहीं घुटने टिकाए हुए भी दिखाई देती है | इतिहास की पुस्तक इन तथ्यों से भरी पड़ी है |
राजलक्ष्मी को चिरकाल तक भोगने की इच्छा वह कमजोरी है जो राजाओं को सत्य जानने के लिए प्रेरित करती है जिनसे संसार चलता है |
धर्म जो पहले पहल (हमने लेख की शुरुआत में देखा )व्यक्तिगत आस्था ,विकास और उत्तरीकरण का मार्ग था , वह आगे जाकर ,एक अवस्था प्राप्त होने पर, लोक कल्याणकारी रूप धारण कर लेता है |साधक सोचता है कि मैंने जो आनंद प्राप्त किया है वह अधिकतम जन तक पहुंचे |इस प्रयास में (पुरानी राजतंत्र व्यवस्थाओं में )राजा को प्रभावित करने विभिन्न मत वादी आते हैं| वे जानते हैं कि अगर राजा उनके मत के अनुकूल हुआ तो बहुसंख्य प्रजा स्वयमेव राजा की अनुरागवश उनके मत की अनुयाई हो जाएगी |राजा स्वयं एक अतिरिक्त ऊर्जा को खींचने वाला होता है| हम जिसे मुख्यधारा कहते हैं वह अधिकांश राजा अभिमुख होती है |
एक अन्य कारण भी होता है जुड़ाव का | वह है आकर्षण |राज स्थान सतत असमाधि का स्थान होता है |इनकी जान को कोई ना कोई क्लेश लगा ही रहता है | इसलिए संतो के यहां शांति ,प्रसन्नता और कल्याण का वातावरण इन्हें आकर्षित कर लेता है |
इस शीर्षक को यहां रखने का लक्ष्य यह है कि पाठक धर्म और राज्य -इन दो सत्ताओं के आपसी संबंध के ताने-बाने के कुछ पहलुओं को समझे |
लॉकडाउन , उस अद्भुत किताब का पढ़ना मार्च 2020 मे भारत मे लॉकडाउन लगा था | हमारी जिंदगी की सक्रियता खत्म हो गई |अचानक भीतर की गति धीमी हो गई | ब्रन्च करके हम शाम तक खाली रहते थे | टीवी देखते थे तो लगता था कि साल 2020 चल रहा है |टीवी ,मीडिया का अविष्कार हो चुका है |फोन पर रिश्तेदारों से भी कितनी बातें करें |वही बातें थी रोज की |
उन दिनों में मैंने मुगल इतिहास पढ़ना शुरू किया था | यूं ही |बिना किसी योजना के | दोपहर को दो ढाई घंटे पढ़ने की रूटीन बनी थी |उन दो ढाई महीनों में मैंने बहुत सी किताबें पढ़ी थी |इसी क्रम में मुगल शहजादे दारा शिकोह पर लिखी हुई किताब पढ़ी और मुझे 17वीं शताब्दी में जन्मे इस अद्भुत व्यक्ति को जानने का मौका मिला |जो एक राजकुमार था ,दार्शनिक था |
मजूमदार की इस किताब में एक चैप्टर है जो दारा शिकोंह की किताबों के ऊपर उनका सार , संक्षिप्त टिप्पणी ,आलोचना प्रस्तुत करता है | उस चैप्टर में दारा शिकोंह मुस्लिम धर्म के सिद्धांतों को क्रमवार रखते हुए ,चिंतन करते हुए ,कठोर बौद्धिक- तार्किक प्रक्रिया से गुजरते हुए यह ऐलान करता है कि वह खुदा परस्त नहीं है ,खुद परस्त हो गया है |आगे इस चैप्टर में एक वृत्त की 4 अवस्थाओं का जिक्र है ,जो हर धार्मिक को पार करनी होती है |
इस किताब का मुझ पर बहुत अद्भुत प्रभाव हुआ | मुख्यतः मुस्लिम धर्म की शब्दावली होने के कारण मैं ज्यादा तो नहीं समझी पर इस चैप्टर का "हिट पॉइंट " मुझे समझ में आ गया |वह गिचपिच जो बहुत तरह की धार्मिक व्याख्या के कारण बन गई थी ,वह एकदम से मिट गई |
"अरे ! यह जो लोग अपनी अपनी व्याख्या को श्रेष्ठ बताने के लिए लड़ रहे हैं वास्तव में यह नहीं जानते कि यह सभी सही हैं, गलत कोई भी नहीं "अगर कुछ गलत है तो वह है स्वयं को सही कहना, दूसरे को गलत कहना | अन्यथा ध्यान से देखें तो सभी व्याख्याएं मूल शास्त्रों के किसी न किसी बात की पुष्टि करती है |आलू प्याज में दोष देखने वाले भी सर्वथा गलत नहीं है |वनस्पति काय के वर्णन में जमीकंद की व्याख्या हमारे शास्त्रों में इस रूप में की गई है |
पाठक यह भी ध्यान दें कि यूं तो मैंने इस लेख में जगह-जगह "मैंने चिंतन किया " शब्द प्रयोग किए हैं पर यहां मैं कहना चाहती हूं कि यह बात तो मेरे चिंतन में कभी नहीं आई थी| ना मैंने कभी सुनी थी |
इस नई उद्भावना के आलोक मे मुझे लगा की धार्मिक व्याख्याताओं का लड़ना तो वैसी बात हुई कि एक बस में खड़े हुए लोग सीट के लिए लड़ रहे हैं | नए लोगों को भरे जा रहे हैं | अनंत काल तक वह लड़ते चले जाएं बिना यह जाने कि वह बस में क्यों बैठे थे | उन्हें कहां जाना था |
धर्म भावना का विषय है या बुद्धि का मुख्य रूप से धर्म रागात्मक जुड़ाव का विषय है |अधिकांश जन जहां जन्म लेते हैं वही अपने माता-पिता ,अपने पारिवारिक धर्म, धर्म गुरु तथा स्थान से जुड़ जाते हैं तो आजीवन वही जुड़े रहते हैं |
सामान्य जन बौद्धिक विमर्श में घुसते नहीं |अपने धर्म के धार्मिक विमर्श में घुसे भी तो तुलनात्मक धार्मिक विमर्श में तो बिल्कुल नहीं घुसते |खुद मेरी यात्रा भी ऐसी ही रही है | मैं भी एक चलती हुई समृद्ध धार्मिक विमर्श की परंपरा के कारण ही इसके लाभ को अनायास पा गई और आगे चलकर उससे भी अनायास ढंग से एक पुस्तक के जरिए मैं एक दूसरे धर्म के धार्मिक विमर्श के एक बड़े " क्लू " को प्राप्त कर पाई| धार्मिक संसार में इसलिए भगवत कृपा की बड़ी महिमा बताई जाती है |मैं भी यही कहती हूं |यह सब कृपा के द्वारा ही पाना संभव है |
धर्म बुद्धि का विषय भी है |धर्म के विषय- आत्मा ,पाप ,पुण्य,ज्ञान ,दर्शन, चारित्र ,तप , योग ,उपयोग ,क्रिया ,गति आगति, स्थिति इत्यादि बिना बुद्धि के तो इंसान जान नहीं सकता है |इन विषयों में तर्क वितर्क, चिंतन मनन करने की क्षमता भी एक बुद्धि संपन्न व्यक्ति ही कर सकता है|
एक विषय पर अलग-अलग मत होना बड़ी ही स्वाभाविक बात है |असली कहानी इसके बाद शुरू होती है क्योंकि यहां से अहंकार की यात्रा शुरू होती है |व्यक्ति झुकना नहीं चाहता है |वह संसार भर को अपने पक्ष का सहीपन मनवाना चाहता है | इसलिए वह अपना बल ,तप , संयम, विद्या सब कुछ आजमाता है |
pov की लड़ाई ही मुख्य लड़ाई है | इसलिए pov की दृष्टि से देखूं तो शायद आज मैं अपने गुरुदेव के नजरिए की आलोचना भी कर सकती हूं, पर मैं करूंगी नहीं | उसकी जरूरत भी नहीं |अपने ऊपर गुरुदेव के महान उपकार तथा उनसे रागात्मक जुड़ाव के कारण | साथ ही मुझ में यह बोध भी है कि हर एक मनुष्य अपने समय और साधनों की निर्मिती होता है | हर एक व्यक्ति अपनी सीमाओं और शक्ति का पुंज होता है | सीमाओं के रहते हुए भी अंत- अंत तक अपनी शक्ति के सहारे मेरे गुरुदेव का जीवन शानदार, चमकीला रहा है |
उपर्युक्त चिंतन का सार यह है कि धर्म एक संवेदनशील विषय है | इसकी आरंभिक शुरुआत बहुदा किसी घनघोर भावात्मक, रागात्मक जुड़ाव में होती है | यह व्यक्तिगत स्वतंत्र की पहला मौलिक अधिकार है | राज्य के साथ इसका संबंध स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण का ही होना उचित है |भारत जोड़ो यात्रा इस अधिकार के राजनीतिक संरक्षण की यात्रा है |
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