गुरुवार, 5 जनवरी 2023

दया का कांसेप्ट

यह बात मैने पहले लिख रखी थी ।कुछ पेरेंट्स की हेल्थ इशू है । ...अभी ठीक है ।

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3- 4 साल पहले की बात है  । हम पति के बड़े भाई साहब के साथ आपनो घर ,बूढ़पुर पर गए थे । जाने से पहले हमारी घर में बहुत बहस हुई थी ।बहस का मुद्दा था- दया का कांसेप्ट ।

मेरी धर्म रूचि विख्यात है। इसलिए इसके वर्जन के लिए मैं जब तब सबके निशाने पर आती रहती हूं।  वह हमें आपनो घर ले जा रहे थे और उसका इतिहास भी बता रहे थे कि किस तरह एक डॉक्टर ने एक ऐसी दीन -दुखी- बेघर महिला को देखा जिसका सिर कीड़ों ने खा लिया था। उनके मन में दया आई। उन्होने उसका इलाज किया और इस तरह आपनो घर का विचार साकार हुआ ।

 तू अपना लक्ष्य बना कि तुझे भी उस डॉक्टर जैसा बनना है । बाकी सब छोड़ दे ।यह होता है असली धर्म - भाई साहब समझा रहे थे ।

मुझे तो स्थानक जाने और ज्ञान सीखने में मजा आता है- मैंने कहा । पति और घर के बाकी लोग हंस रहे थे ।

बस बता दिया तुझे। असली धर्म यह है बाकी सब तो यूं ही.....-  भाई साहब ने अपने मत पर जोर दिया  ।

उस समय उनके चेहरे पर आए भाव देखकर मुझे फील हुआ कि शायद वे जानते हैं स्थानक में कहे जा रहे धर्म के असलीपन को...... मगर कह नहीं पा रहे।  क्योंकि कहने का अर्थ अनिवार्य रूप से अपना पक्ष रखना होता है।  अपना पक्ष रखने का अर्थ है उस पर स्थित रहना, उसके प्रतिबद्ध होना।  यह अनिवार्य रूप से एक ऐसी लड़ाई है जिसकी गहराई में वे घुसने  नहीं चाहते ।शायद उनकी इतनी योग्यता - क्षमता नहीं है।

 देखो! जिस तरह तुम लोग मुझे बता रहे हो कि वहां इतनी दीन -मरी हालत की औरतें रहती हैं और इस तरह उनकी देखभाल की जाती है । अच्छी बात है।बहुत अच्छी बात है ।पर मुझे माफ कर दो। मैं नहीं देख सकती । बहुत ज्यादा मरी- गली हालत में लोगों को मैं नहीं देख सकती हूं । मुझे स्वस्थ, हंसते हुए, खुशदिल लोग अच्छे लगते हैं ।

मेरी बात से सब लोगों में एक घिन सी उपजी । देखो ! कैसी ढीठ है यह । कैसी लीक विरुद्ध बातें कह रही है। क्या समय का पता चलता है ।आज अच्छा चल रहा है। कल को खराब भी आ सकता है ।फिर क्या इंसान को ऐसे बड़े बोल बोलने चाहिए ।

 देखो !अभी मैं स्थानक में सामायिक करके ,गुरु दर्शन करके ,शास्त्र पढ़कर इत्यादि करके बहुत खुश हूं। तुम यह करना चाहते हो तो करो ।मैं तुम्हें नहीं रोक रही। तुम कह सकते हो मेरे भीतर की अहिंसा अभी कच्ची है ।वह अभी इतनी नहीं पकी है कि मैं खुद को तैयार कर सकूं ऐसे लोगों की मदद के लिए। मदद करना तो दूर मैं तो देख भी नहीं पाती ।

सब ढोंग है तेरे - भाई साहब ने कहा ।बाकी लोग बहस के मजे ले रहे थे ।

अच्छा यह तो मैं तुम लोगों के लिए भी कह सकती हूं ।तुम लोगों के लिए भी कह सकती हूं कि तुम लोगों की दया तभी उपजती है जब इंसान इतनी ज्यादा बुरी हालत में पहुंच जाए। क्यों तुम थोड़े स्वस्थ ठीक ठाक हालत में दिखने वाले की मदद नहीं करते। - अब की बार मैंने बैक प्ले किया ।

 उनकी क्या मदद करनी है।वे तो हटटे -कट्ठे होते हैं ।खुद कमा कर खा सकते हैं -पति ने उछल कर कहा ।

 अच्छा जी! तो इसका मतलब तुम तो कती कठोर किस्म के देवता हो। तुम्हारी दया पाने के लिए तो इंसान को लूला लंगड़ा होना होय। तब जाकर तुम्हारी कृपा की दृष्टि प्राप्त होगी- मैं हंसी।

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 हम वहाँ  गए। वहां ढाई सौ के करीब औरते थी । एक बड़े हॉल में जगह-जगह बैठी थी । 3-4 टीवी स्क्रीन लगे थे। बिल्डिंग भी ठीक थी ।ऑफिस में वहां के कर्मचारी ने हमें वहां की प्रमोशन फिल्म दिखाई । वही बातें थी जो भाई साहब घर पर बता चुके थे।

 जब हम आ रहे थे, एक औरत पीछे चीख रही थी- यह मुझे घर नहीं जाने देते -कह रही थी।

 वही होना था। जो मैंने एक्सपेक्ट किया था। मन विचलित हो गया ।हम सब स्वच्छता, सभ्यता और पुण्य - प्रकर्षता के जिस मजबूत भ्रम में रहते हैं वह छिन्न-भिन्न हो जाए, अगर एक दिन खाना ना मिले तो ,एक हफ्ता नहाना, अच्छे कपड़े, बाल ना बनाएं तो। कितना जतन लगता है इसे बनाए रखने के लिए। बहुत बार इंसान हिंसा पर उतारू हो जाता है।

 लेकिन मूर्ख मनुष्य यह नहीं जानता कि यह भ्रम कभी स्थिर नहीं रहने वाला ।यह अज्ञानता ही सबसे बड़ा भ्रम है । स्थानक में हमें हमारी इस अज्ञानता का ही तो ज्ञान कराया जाता है। लौटते हुए गाड़ी में मैं यह बातें कह रही थी कुछ अलग ढंग से। भाई साहब सुन रहे थे। सब हंस रहे थे ।

तेरी बात तू जान- शायद उनके चुप का यह मतलब था । 

2 दिन लगे बूढ़पुर के इफेक्ट से बाहर आने में। आखिरकार गुरु देव धन्ना मुनि जी के दर्शन करके मेरा मन पुनः प्रसन्न हुआ ।


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