कभी कभी मुझे लगता है ,हमारा प्रेम....प्रेम नही एक कैद है । ना जाने देते हैं ,ना जीने देते हैं ।.....पर क्या करे ,रूल ही ऐसे है ।
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इस बात से मुझे याद आई वे मजेदार बातें जो मैने प्रवचनों में गुरुओं के मुख से सुनी ।
संयम जीवन को रेत के समान नीरस कहा गया है । 😊 सर्दी-गर्मी-भूख-प्यास-बीमारी-याचना-सदा विहारी जीवन-मच्छर (22 हैं ।शास्त्र की भाषा मे इन्हे 22 परीषह कहते हैं ।)
ऐसे जीवन को अपनाने के पीछे एक गहरा जीवन दर्शन है ,ज्ञान है ।मगर जब तक साधक वहां तक नही पहुंचता , तब तक तो वह भी सामान्य व्यक्ति के समान उहापोहों का शिकार होता है ।
श्रद्धा का अवलंब ही एकमात्र वह रोशनी की लकीर है जो संशय के घटाटोप मे इंसान की जीवन-शक्ति को जी-लाए रखती है ।
संयम जीवन की नीरसता को गुरूदेव आत्मव्यंग्यात्मक रस से दूर करते थे ।
1 स्वयं धर्म गुरू होते हुए भी सुन्दर मुनि जी कहते है - दुनिया की सारी नही तो आधी समस्याओ का निपटारा हो जाए, अगर इन धर्म गुरुओं का मुँह बन्द कर दिया जाए।
2 स्व गुरूदेव सुदर्शन लाल जी म के जीवन की यह घटना है कि वे एक बार एक घर मे आहार के लिए गए ।बहन प्रचंड अवस्था मे थी ।किसी बात पर अपने लड़के को कह रही थी -तू मर जाए तो अच्छा हो ।घर मे घुसते हुए गुरूदेव ने यह बात सुनी ।वे बोले -बहन इसे हमे दे दे ।हम साधु बना लेंगे।
बहन गुरूदेव को देखकर सकपका गई। एकदम बोली -ना ये तो मुझे बहुत प्यारा है ।
क्यो अभी तो तू इसे मौत को दे रही थी ।हम क्या मौत से भी बुरे है ।😊
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दुनियावी जिन्दगी तो ऐसी अनेकानेक त्रासदियों से भरी हुई ही है कि अगर इंसान मे हँसने की क्षमता ना हो तो वह कब का परलोक की राह पकड़ ले ।
यह चुटकला मैने सुन्दर मुनि जी म के मुख से सुना है ।
एक बार एक ज्योतिष-पत्री देखने वाले महाराज के पास एक आदमी पहुँचा कि म शनि की दशा चल रही है ,कोई उपाय बता दो ।
म बोले -100 रुपए दक्षिणा लगेगी ।
आदमी बोला -इतने रुपए तो नही है ।
म बोले - कोई नही ,50 दे दो ।
आदमी बोला - म इतने रुपए भी नही है ।
म ने सोचा - आज तो लगता है मेरे ऊपर ही शनि की दशा है जो सुबह सुबह इस आदमी के दर्शन हो गए है ।पर कोई बात नही , मै भी हार नही मानूगा ।
प्रकट मे म बोले -है तो मुश्किल। मगर कोशिश करूंगा । 10 रुपए दे दो ।
आदमी बोला - म इतने रुपए भी नही है ।
अब महाराज का धैर्य चुक लिया ।म बोले- आप जाओ ।निश्चिंत रहो ।शनि भी तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ सकता ।😂
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