सोमवार, 28 नवंबर 2022

दृश्यम -2

 

कुछ दिन पहले हम यह फिल्म देखकर आए थे।  मेरा तो मन नही था ।महक की तबीयत भी खराब थी। तो चलो ,फिर भी चले गए।
हमारी सीट बिल्कुल बैक मे थी ।वहाँ स्पीकर की आवाज दृश्य से पहले गूंज रही थी ।
मैने एक वीडियो देखा था ।जिसमे फिल्म के बैकग्राउंड आवाजों की टेक्नीक  दिखाई थी  ।दो आदमी बैठे थे ।20-25 तरह की चीज लेकर ।चेन,कंचे,सीटी ,ड्रम,डंडा,पापड़,कागज,पानी वगैरह

सीन देखकर उसके हिसाब से आवाज जोड़ रहे थे ।कमाल है ।

मै आ रही आवाजो की टेक्नीक सोचने लगी ।कुछ टाइम ऐसे पास किया ।
देखो! किस तरह आवाजे निकालकर भय,त्रास का वातावरण क्रिएट कर देते है ।
इस तरह दृश्य को आवाज से अलग कर दो तो आधा प्रभाव खत्म।
स्टोरी पर क्या बात करना  ।
अक्षय खन्ना शुरू से ऐसे चालाक ही लगे हैं ।अब बाल नही रहे ।तो सख्त लुक देने के लिए कुछ एक्स्ट्रा करना ही नही पडता ।शक्ल से ही काम चल जाता है ।
अबकी बार तबू का रोल कम कर दिया  ।
एक बात मुझे बुरी लगी।
इन लोगों ने जैनियों के क्षमा -पर्व पर बोले जाने वाले 'तस्स मिच्छामि दुक्कडं' पर अशिष्टता की है ।एक उत्तम आचरणीय धर्म और कर्म पर बिना विचारे अशिष्टता की है ।
इसका स्टोरी से कोई लेना-देना नही है ।तबू जैन नही है ।न ही उनके पति जैन है ।
और अगर वे जैन भी होते तब भी इस तरह की टिप्पणी का स्टोरी के हिसाब से लाॅजिक यह था कि जब यह विमर्श लम्बे समय से उनके चिन्तन मे चला हो ।
हजारो लोग जैन होते है ।उनके साथ सुख-दुःख बीतता है ।पर वे यूं ही उठकर कर्म या भाग्य पर विपरीत टिप्पणी नही करते ।
मुझे गुस्सा आया था ।पर यहां भारत क्या ,विश्व भर मे धर्मों की इतनी राजनीति हो रही है कि मै जैनियो की राजनीति का एक फ्रेश एडिशन क्यो करूं ।
वैसे मेरे कुछ न कहने से भी क्या हो जाएगा ।ये तो पहले से हो ही रहा है ।
शायद न कहकर ही रहना ,इस का शांतिपूर्ण समाधान हो ।इस दुनिया की बहुत सी बाते ऐसी है ,जिन्हे समझ सकते है ,कह नही सकते ।

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