1 - भारत जोड़ो यात्रा
जब राहुल गांधी जी की भारत जोड़ो यात्रा शुरू हुई थी तब 12 वें दिन ही मेरे भीतर यह डिप्रेसिंग फीलिंग आने लगी थी कि "हे प्रभु !इन लोगों ने कितना कठिन व्रत ले लिया है |यह कैसे कर सकेंगे |"पर अब इतने दिनों बाद भी जब मैं इनका उत्साह देख रही हूं तब हैरान हूं |इन लोगों के पराक्रम पर | पराक्रम को हमेशा पुरुषों से जोड़ते हैं| मुख्य रूप से| यूं स्त्रिया भी कम नहीं होती |अगर अपनी पर आ जाए तो फिर तो क्या ही कमाल करती हैं |हमारे आगमों में जगह-जगह यह शब्द आया है -पुरुषकार - पराक्रम 😊
2 - आपस की गॉसिप में , चाहे वह प्रेम में हो या खुन्नस में ,एक अच्छी बात यह है कि कभी-कभी सही तत्व की बातें निकल आती है |लेखकों का कार्य भी कितना दुरूह है | उन्हें उन बातों को शब्दों में कहना पड़ता है दरअसल जिन्हें शब्दों में कहा ही नहीं जा सकता | किसी इंसान ,जानवर ,पेड़ ,धूप-हवा को देखकर आपको जैसी प्रतीति हुई है उसे कोई किस तरह कहे |
मेरे साथ तो यह हुआ कि एक कहानी पोशाक में मैंने स्वयं यह बात लिखी है |
धूप,बारिश,भूख प्यास का ज़रा भी ख्याल नहीं था उसे। या कहें ये सब महज़ शब्द नहीं थे उसके लिए ,इन शब्दों की दैहिक वास्तविकता को वह भली भांति समझती थी।
और अब मैं खुद ही इन शब्दों का अर्थ भूल गई हूं | लगता है मैं उस फील से दूर चली गई हूं |
यह भी आलोचना का एक विषय है |इसे काव्य सत्य कहते हैं |कवींद्र रवींद्रनाथ ने भी 'तथ्य और सत्य' नामक लेख में इस पर विचार किया है |
काव्य सत्य अमूर्त है |शब्द मूर्त हैं |जबकि अमूर्त सत्य तक पहुंचना तो सबके बस की बात नहीं लेकिन मूर्त को ज्यों का त्यों उठाकर ठेलने के लिए तो विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है |जब धर्म के क्षेत्र में यह जेबकतरापन होता है तो बाकी दुनिया में हम -आप किस खेत की मूली है |चलते रहिए |उदासीनता के लाभ जानिए |
****
थोड़ा ठहर कर मैं इस मसले पर जब विचार करती हूं तो मैं इसकी दो दिशा पन (two way direction one road ) की शक्ति को पहचान लेती हूं | इस बात का तात्पर्य यह है कि -
एक भाव स्थिति तो यह है कि आप उस तरह उच्चता को स्वयं महसूस कर पाने में (आप सहृदय है )तथा कह पाने में(आप साहित्यकार हैं ) सक्षम है |आपकी बुद्धि भी इसमें स्थिर हो गई है |
दूसरी स्थिति यह है कि' सुनकर'( क्योंकि काव्य सत्य है अर्थात प्रेम, सौंदर्य इत्यादि| यह सब एक व्यापार भी है |और बल्कि कहना चाहिए कि काफी बड़ा व्यापार है| संसार में चारों तरफ ही प्रेम से भरे गीत ,कविताएं ,किस्से कहानियां सुनाई जाती हैं |)आप इस तरह के भाव की उच्चता की श्रेष्ठता से आकर्षित होते हो पर आपकी बुद्धि इसमें स्थिर नहीं है | बुद्धि स्थिर ना होने के कारण कुछ भी हो सकता है |आपके अनुभव वगैरा|या और कुछ |
मेरी खुद की शुरुआत दूसरी स्थिति से हुई है |जहां तक मैं समझती हूं आज के युग में अधिकांश भावुकों की शुरुआत की 99. 99 परसेंट संभावना यही है |
2012-13 के साल में ,मैं साहित्य की प्रेमी पाठक नहीं बल्कि क्षुब्ध पाठक थी |मुझे साहित्य से गहरी क्षुब्धता थी |इन किस्से कहानियों में संबंधों के जैसे रूप दिखाए जाते हैं वैसे असल जीवन में तो होते नहीं हैं, फिर इन्हें पढ़ने का क्या लाभ | साहित्य तो' होना चाहिए' का एक नकली खालीपन हमारे भीतर भर देता है और हम इसके पीछे अनवरत दौड़ते रहते हैं| भटकते रहते हैं |इसके पीछे हम असली 'है' की उपेक्षा करते हैं |
लेकिन इसका आकर्षण और प्रभाव भी बढ़ा तीव्र है | अब क्या करें !
शायक आलोक ने कविता में 'द्वन्द्व की तीव्रता " को निपट बौद्धिक जरिये से सुलझाया है |वह कविता में शब्दों से खेल करते हैं | इस खिलवाड़ में दरअसल वे कविता की भावित शक्ति और यथार्थ के बेमेलपन से उपजे ' द्वन्द्व की तीव्रता ' को उड़ा देते हैं |
और कविता की दुनिया की खासियत देखिए कि उनकी यह खिलवाड़ भी कविता ही कहलाती है |
मुझे उनके यह प्रयोग अच्छे लगते थे |मैं इसी तरह का कुछ कहानी में करना चाहती थी | पर मैं उस राह पर बढ़ी नहीं |कह नही सकती निपट बौद्धिकता आपको भावनात्मक रूप से क्या बना देती है ।
मुझे तो महावीर स्वामी जी ने बचा लिया । दरअसल बुद्धिमंदत्ता और आलसीपन यूं तो व्यक्ति के दुर्गुण गिने जाते हैं पर यह आपको जीवन में बहुत से अवांछित संक्लेशों से बचा भी लेते हैं ।
साहित्य के साथ-साथ मैं जैन आगम भी पढ़ती थी |इस पढ़ाई ने उन मसलों को समझने में मदद की जो साहित्य ने पैदा किए थे|
आगमों में केवल ज्ञान के विषय में यह सूत्र है कि केवल ज्ञान का विषय सामान्य श्रोताओं के लिए श्रुत ज्ञान का विषय हो जाता है अर्थात एक दुबई गया हुआ व्यक्ति वापस लौट कर किसी को बताए तो वह कितना भी बता ले वह दुबई के घूमने के वास्तविक अनुभव के समान नहीं हो सकता|
पहली स्थिति मे काव्य अभिव्यक्ति है |
दूसरी स्थिति मे यह भाव परिष्करण की प्रक्रिया है |काव्य के इस प्रकार्य को भी आचार्यों ने मान्य किया है |
आगे का रास्ता तो आपकी स्वयं की बुद्धि की स्थिरता पर है |
मुझे तो महावीर स्वामी जी ने बचा लिया ||
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें