एग्री | मीठे का शरीर में ऐसा ही प्रभाव होता है | यह मैं अपने अनुभव से भी कह सकती हूं |बच्चों को चोट लगने पर उनके मुंह में चीनी डाल देते हैं | पता नहीं यह उनके दर्द को किस तरह कम करता है पर वे चुप हो जाते हैं |
मुझे 7- 8 साल हो गए हैं मिठाई छोड़े हुए | 5-6 साल से मैदे का भी त्याग है ।घर के बने मीठे की छूट है -हलवा, पिंन्नि ,आइसक्रीम वगेरह | यह नियम मुझे मेरे भाई ने कराया था |उसे उसके गुरुजी ने कराया था |पहले मुझे मेरे भाई से यह कंपटीशन था कि कहीं वह धर्म में मुझसे आगे ना निकल जाए |इसलिए जब उसने मीठे का त्याग किया तो साथ में मैंने भी कर दिया|
अपनी विल पावर पे मीठे का त्याग करना मेरे लिए असंभव था |चाहे मैं इसके नुकसान के कितने भी लेख पढ़ लेती | इसलिए मैं घर में कई बार मजाक में कहती हूं कि राजू तो कोई पुराने जन्म का ऋषि है |उसका जन्म ही मेरा उद्धार करने के लिए हुआ है |वह भी आशीर्वाद में अपना हाथ उठा देता है |
अब तो शुगर हो गई है |हम दोनों को |पहले उसे हुई ।
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मैंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के एक लेख में भी इस तरह की बात पढी थी कि भावनात्मक लगाव ज्ञान से ज्यादा प्रभावशाली होता है |सही बात है |इस बात को मैं थोड़ा परिष्कार करना चाहती हूं | मैं कहना चाहती हूं कि इंसान को अपने जीवन में प्रशस्त भावनात्मक लगाव से जुड़ना चाहिए , अप्रशस्त से नहीं |
शास्त्र में दो प्रकार का राग बताया गया है -प्रशस्त और अप्रशस्त ।
एक अन्य बात मैं जो कहना चाहती हूं वह यह है कि मीठे के प्रति अपनी आसक्ति देखकर मैं भी एक बात से घनघोर आश्चर्यचकित थी |मैं यह देखकर हैरान थी कि देखो दुनिया में शराब की आसक्ति की कितनी बदनामी है | शराबियों को लोग कैसे बहिष्कार कर देते हैं |मीठा खाने वाले लोगों को तो कोई भी लांछन नहीं करता |विशेषकर धार्मिक लोग इस विषय में कितनी अज्ञानता में जीते हैं कि शराब पीने वालों से तो बहुत ज्यादा दूरी करते हैं लेकिन वे खुद मीठे या इस तरह की अज्ञानता के विषय में उतने सचेत नहीं होते |social stigma
लेकिन साथ में मैं यह भी कहूंगी कि इस पुस्तक के निष्कर्ष को शराब पीने के तर्क के रूप में तो इस्तेमाल नहीं किया जा सकता |अब दोनों तरह के नशों का तुलनात्मक प्रभाव क्या है ,यह तो कोई विज्ञानी ही जान सकता है | अगर आचरण के रूप में मुझे पालन करना हो तो मैं बताए गए निषेध कार्य को ना करके ही इसका पालन करूंगी |
good read .
पुनश्च :इस बात को जानने के लिए तो विशेष ज्ञान की आवश्यकता नही है ।यह तो चक्षु इन्द्रिय प्रत्यक्ष अनुभव है कि मीठा खाकर किसी को ऐसे लड़खड़ाते तो नही देखा जैसे बाकी नशा करने पर लोग करते हैं ।☺️खैर
निस्संदेह फूड तो हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व के केन्द्र मे है ।प्राचीन भारतीय चिन्तन मे तो इस पर बहुत गम्भीरता से विचार हुआ है ।
आत्मज्ञान चिन्तन के केन्द्र मे है ब्रह्मचर्य का पालन। ब्रह्मचर्य के केन्द्र मे है भोजन संबंधी विधि-निषेधों का परिपालन ।
नोट :चक्षु इन्द्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान का एक भेद है ।मै सप्रयास जैन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग अपनी पोस्ट मे करती हूं ताकि पाठक बिना प्रयास के ही इस ज्ञान मे कुशल हो जाए।
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