सोमवार, 14 नवंबर 2022

विभिन्न क्षेत्रों में मॉडर्न साइंसेस के अध्ययन निश्चित रूप से चीजों को देखने के लिए हजारों नजरियों का विस्तार करते हैं| वह चाहे सामाजिक क्षेत्र हो या मीडिया |पीएचडी में मेरा टॉपिक महानगरीय बोध  पर था |उस दौरान मेट्रोपॉलिटन स्टडीज पर कई किताबें पढ़ी थी |सब तो नहीं पर कुछ किताबें मुझे बहुत पसंद आई थी |

इस तरह के अध्ययन की कुछ सीमाएं मैंने उस समय अनुभव की थी वह मैं शेयर कर रही हूं -

*इस तरह के अध्ययन एकांत बौद्धिक होते हैं| शायद यह  मेरे मूल स्वभाव के खिलाफ है इसलिए उस समय मुझे बहुत डिप्रेसिंग लगते थे | जनसंख्या और गैर कृषि कार्य -यह दो बातें हैं जो महानगर को गांव और कस्बों से अलग करते हैं | उसमें यह सब लगातार पढ़ते हुए मुझे लगता था कि मैं महानगर में सैकड़ों लोगों के नीचे दब गई हूं | कई लेखों में महानगर का रूपांकन भी  एक विशालकाय मशीनी दैत्य के रूप में तरह किया जाता है| खैर |वह तो पीएचडी का विषय था |करना ही था ,सो कर लिया था |

* उस समय अपने शोध निर्देशक डॉ प्रभात कुमार से बातचीत करते हुए हम यह नतीजे देखकर हैरान थे कि मनुष्य के स्वभाव पर महानगर के इतने विनाशकारी प्रभाव को देखते हुए भी क्यों महानगरीकरण बढ़ता ही जा रहा है |लोग महानगरीय जीवन छोड़ते क्यों नहीं | 

मैं भी नहीं छोडूंगा -खुद प्रभात जी ने भी यही कहा 

मैंने पूछा -क्यों 

कहने लगे -पता नहीं 

 अर्थात इस तरह के अध्ययन समस्या को चिन्हित कर देते हैं |उसके दुष्प्रभाव का दायरा भी दिखा देते हैं पर निवारण क्या है इस पर इनमें कोई संकेत नहीं होता|

 मैं अपनी ओर से 1-2 सुझाव रख सकती हूं -

*सबसे पहली बात नोट्स बनाएं 

*लक्ष्य स्पष्ट रखें |आप जो कुछ पढ़ रहे हैं वह पढ़ने  का लक्ष्य क्या है |

*सहमति और असहमति के पॉइंट लिखते चले|


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