1 इस ब्लॉग मे कई जगह पर 'my team-my vision' हेडिंग मे कुछ टिप्पणियां है ।यह 2012-13 के आसपास की बात है ।तब से यह रूक-चल-ठहर-बोल-चुप-डैडलाॅक मोड मे चल ही रहा है ।मै तो 16 मे चली भी गई थी ।
इसमे भी कई फेज आए ।शुरूआत मे इसमे कस्बाई कौतुहल था कि जहां देखा नही कुछ खिचड़ी पक रही है ,वही सब आ गए। तब से अब तक....खैर
यह मूलतः साहित्य की शक्ति की प्रतिष्ठा का विचार था ।मेरे लिए यह एक बिजनेस आइडिया था ।अगर हम उस तरह चलते तो अब तक एक चैनल तो खरीद लेते ।😊 खैर
कुछ लोगों के हॄदय आदर्श कल्पनाओं से भरे थे ।बेहतर दुनिया ,काली वगैरह। अच्छी बात है ।खैर
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अब तो मै ही बदल गई हूं ।देखते है ।आगे क्या रहेगा ।
2 लेखक को बोलने वाला होना चाहिए या चुप्पा ।पता नही ।वैसे तो मै भी कम बोलती हूं ।
मेरे गुरूदेव सेठ जी महाराज भी बहुत कम बोलते है ।हमारे समाज मे उनका नाम ही प्रसिद्ध है --मौनी बाबा ।
1996 मे जब मै उनसे जुड़ी थी तो उनकी एकांत-शांत चर्या देखकर बहुत विस्मित होती थी ।बाकी संतों के पास भीड़ जमा है ।बाते कर रहे हैं ।हँस रहे है ।ठहाके लग रहे हैं ।
सेठ जी म एकदम एकांत-शांत ।
उस समय की अपनी समझ के अनुसार मेरे मन मे आया कि अवश्य इनके मन मे कोई चोट है जो ये बोलते नही ।
कही बाकियों ने इन्हे छोड़ ( अबन्डन)तो नही रखा ।
मुझे उनसे सच्ची सहानुभूति हुई।
आप भी बोला करो ।जैसे सब बोलते है ।
तुझे बात करनी है तो और यहां कितने है ।उनसे कर ले ।मेरे से करनी जरूरी है ।
अईं
चार-पांच दिन के बाद मुझे खुद ही समझ मे आ गया ।सतह के ऊपर चंचल लहरों की खेलवाड़ और सतह के नीचे की गहरी गहराई।
जिन्हे मेरे कम बोलने से शिकायत हो ,वो यह समझ ले कि मैने तो सबसे बड़े मौन रहने वाले के साथ काम चलाया है ।उनके मुकाबले मै तो फिर भी बहुत बक्कड हूं ।
श्री सेठ जी महाराज के गुणगान मे कुछ पंक्तियाँ-
हे सेठ जी म तुम धन्य
तुम्हारा जीवन धन्य
वर्तमान मे तुम्हारी संलेखना धन्य
तुम्हारे पिता धन्य
तुम्हारी माता धन्य
तुम्हारे भाई धन्य
जिस धरती पर तुम पैदा हुए
वह धरती धन्य
जिस धरती पर तुम विचरे
वह धरती धन्य
तुम्हारे गुरू धन्य
तुम्हारे गुरूभाई धन्य
तुम्हारे शिष्यसम शिष्य धन्य
(गुरूदेव ने अपने नाम से शिष्य नही बनाए थे )
तुमने जो आहार ग्रहण किया
वह आहार धन्य
जो हवा तुम्हे छूकर बही
वह हवा धन्य
जिस दिन तुम्हारा नाम सुना
वह दिन धन्य
जिस दिन तुम्हारे दर्शन किए
वह दिन धन्य ।
हे गुरूदेव!तुम्हारा होना धन्य
तुम्हे प्राप्त करना धन्य! धन्य!
3 सत्ता के साथ आवश्यक रूप से लगी हुई बुराई है - सत्ता का प्रचंड अहंकार। इससे आम आदमी तो क्या , खुद सत्ताधारी भी डरते है ।जाने कब पासा पलट जाए ।
ये लोग खुद इस सतत भय मे जीते है ।
पुराने जमाने के राजाओं के अहंकार तो फिर भी समझ आएं ।वे तो अपनी कुरसियो पर पीढी दर पीढी बैठते थे ।आजीवन बैठते थे ।
इन 5-10 वालों के भी क्या अहंकार। #धत_तेरे_की
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