धर्म की सबसे सरलतम व्याख्या ये है, जितना समझ में आ जाए। अगर किसी को अपनी बुद्धि, अपने ज्ञान, और अपने अनुभवों से यह समझ में आया है कि' धोखा देना .......' इत्यादि, तो यही उसका धर्म है। अब बात उस पर टिके रहने की है।
'लेखक घर' के विजन के तौर पे ' मन की स्वतंत्रता से लेकर जीव निकाय की सुरक्षा ' को अपनाया है ।
देखा जाए, तो मन कहाँ स्वतंत्र होता है? इस पर कितने बंधन होते हैं। राग के, द्वेष के। कितना संसार पीछे लगा है । बट एक जगह यह स्वतंत्र होता है। धर्म की व्याख्या करने में।
कितने मज़े की बात है ना! धर्म का सर्वोच्च लक्ष्य है मोक्ष । मुक्ति। अर्थात स्वतंत्रता । और .....इस लंबी ,दीर्घ यात्रा में स्वतंत्रता का पहला स्टेप ही इसकी व्याख्या समझने की स्वतंत्रता से शुरू हो जाता है। अर्थात वह सुख जो मंजिल पर पहुंचने के बाद मिलना था, वह इसके पहले स्टेप से ही मिलना शुरू हो जाता है । मेरी समझ मे इसे धर्म का सबसे विलक्षण गुण कह सकते हैं। खैर
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