अभी हाल ही में मैंने साहित्य की इकोनॉमिक्स का प्रश्न पुट किया था। कुछ जवाब नहीं आए। मैं भी सोच रही थी।
वर्तमान साहित्यकारों में मुझे वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा जी का साहित्य का बेहद पसंद है।
एक साहित्यकार आपके हृदय को किस तरह से छूता है, यह एक बड़ी ही पेचीदा पहेली है। अक्सर साहित्यकार अकेले के साथी होते हैं। जीवन की ऐसी बातें जिन्हें हम किसी के सामने नहीं कहते ना परिवार में , ना ही परिचितों में। वहाँ एक साहित्यकार उन बातों को संबोधित करके हमारा दोस्त और मददगार साबित होता है।
अब इसकी कीमत क्या हो ?
सच कहूं तो इस मामले मे मै अनट्रेंड हूं । नाशुक्रे तो नही है ।
दर्शन के क्षेत्र मे गुरु से सम्बन्ध भी ऐसा ही है ।इससे थोड़ा ऊंचे लेवल का । वहाँ तो एक ही कीमत चलती है -समर्पण। हो गए हम तुम्हारे जन्म भर के लिए टाइप।
प्राचीन भारतीय आदर्श यही रहा है ।
मैने आगम पढे तो मुझे इस आदर्श के पीछे की गहराई का कुछ अंदाजा हुआ।
इसलिए जमाना चाहे कोई भी हो , आदर्श तो यही रहेगा ।
वर्तमान लेखकों मे इस आदर्श की खूब खिंचाई भी देखी जाती है । वे भी गलत नही लगते ।
सत्य कहीं बीच-बिचाले मे है ।
अब इस आदर्श से ढिलाई दें तो फिर चाटुकार और हर तरह के लोग घुस आते है ।
इसलिए जमाना चाहे कोई भी हो , आदर्श तो यही रहेगा ।
लेखक लिखने मे स्वतंत्र और निर्भीक नही , तो वह लेखक भी नही। बड़ी से बड़ी सत्ता के आगे अदना लेखकों की यह मरोड़ इसी आदर्श की देन है , सर्वथा खोखली भी नही ।
सत्य कहीं बीच-बिचाले मे है ।
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दोस्त होने के नाते 'सर जी हमारा भी करवा देना' , इतना फेवर कहना तो एक्सेप्टेबल है। समझ में आता है।
कहने की इतनी ही मर्यादा होती है। लेखकों के दोस्त वगैरह तो बहुत होते हैं ।
जो हुआ है , बहुत शुभ हुआ है ।
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