रविवार, 18 अगस्त 2024

कल लिखा था । पोस्ट करने से पहले ही झपकी लग गई।  बाद में किया नही । 

पहले क्षोभ था ,आज पढ़कर हँसी आ रही है । पर क्षोभ हो या हँसी ट्रूथ रीमेन्स द सेम ।

.....

लेखकों के सतत क्लेश 

  • किताब नही छपी तो 'इसका कुछ काम ही नही है '।
  • जिसकी ज्यादा छपी है 'रद्दी मे बेचकर भी कमाई हो जाएगी ।
  • 'इस पर' बोले ,'उस पर' क्यों नही बोले ।
  • सिर्फ बोलते हो कुछ करते क्यों नही -एक्टिविज्म की मांग ।
  • जो थोड़े बहुत एक्टिविस्ट है ,ये तो बडी गेम मे है ।
  • विवाद मे खींचने का ट्रैप 'विवादास्पद मुद्दो पर राय बताइये । ओरगैज्म ,एलजीबीटी एटसेटरा। 
  • लेखन/साहित्यिक चोरी ऐसी गुप्त विद्या है जिसे पकड़ पाना और साबित कर पाना तो नामुमकिन ही है ।
  • बड़े से बड़े सत्ताधीश को ललकारने वाले , पर सम्पादक के आगे घिग्घि बन जाती है ।
  • बहुतों ने तो टाइपिंग को ही लेखन मान लिया है ।
  • इधर की मलाई खा ली , उधर की भी -यह कटाक्ष बहुत मारते हैं ।
  • सत्ता का पिछलग्गू -यह भी जाना -माना ताना है ।
दम्भी , दुर्विनीत, प्रशंसा के लोलुप, आत्मप्रशंसक, सतत क्लेश प्रिय ,उथले ,छिछले , असमाधि मन ,

ऐसा व्यक्ति अगर एक ही झेलना पड़े तो निबाह मुश्किल , आत्मीय दायरे मे पल्ले पड़ जाए तो नरक है , 
फिर अपरिचितों के समूह को कौन समझे ।
# observations 
....
 इन्हें यह अहसास तक नही है कि ये कितने vulnerable हैं ।इन्हें इस नहीं तो -उस  , मुद्दे  पर भड़काना कितना आसान है ।

एक किताब के प्रसंग मे ही देखें , देखते ही देखते एक कमेंट के विरोध पर समूह मे ऐसी लिंच की प्यास हावी हो गई कि फिर किताब के कॉन्ट्रैक्ट के खत्म होने पर ही शान्त हुई । 
किसी का क्या बिगड़ा। 
लेखक लड़ता रहा । आर्थिक नुकसान झेला, वो अलग ।
फिर सब शांत ।
सब पुनः अपनी रवानी में ।

अएं ...

...
क्या कोई मिनिमम अहिंसा रूल है , जिसे सब फाॅलो करते है ।
...
अगर दर्शन दुरस्त नही है  ,तो यूं ही आए -गए होता रहेगा।
...

 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें