कल लिखा था । पोस्ट करने से पहले ही झपकी लग गई। बाद में किया नही ।
पहले क्षोभ था ,आज पढ़कर हँसी आ रही है । पर क्षोभ हो या हँसी ट्रूथ रीमेन्स द सेम ।
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लेखकों के सतत क्लेश
- किताब नही छपी तो 'इसका कुछ काम ही नही है '।
- जिसकी ज्यादा छपी है 'रद्दी मे बेचकर भी कमाई हो जाएगी ।
- 'इस पर' बोले ,'उस पर' क्यों नही बोले ।
- सिर्फ बोलते हो कुछ करते क्यों नही -एक्टिविज्म की मांग ।
- जो थोड़े बहुत एक्टिविस्ट है ,ये तो बडी गेम मे है ।
- विवाद मे खींचने का ट्रैप 'विवादास्पद मुद्दो पर राय बताइये । ओरगैज्म ,एलजीबीटी एटसेटरा।
- लेखन/साहित्यिक चोरी ऐसी गुप्त विद्या है जिसे पकड़ पाना और साबित कर पाना तो नामुमकिन ही है ।
- बड़े से बड़े सत्ताधीश को ललकारने वाले , पर सम्पादक के आगे घिग्घि बन जाती है ।
- बहुतों ने तो टाइपिंग को ही लेखन मान लिया है ।
- इधर की मलाई खा ली , उधर की भी -यह कटाक्ष बहुत मारते हैं ।
- सत्ता का पिछलग्गू -यह भी जाना -माना ताना है ।
ऐसा व्यक्ति अगर एक ही झेलना पड़े तो निबाह मुश्किल , आत्मीय दायरे मे पल्ले पड़ जाए तो नरक है ,
फिर अपरिचितों के समूह को कौन समझे ।
# observations
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इन्हें यह अहसास तक नही है कि ये कितने vulnerable हैं ।इन्हें इस नहीं तो -उस , मुद्दे पर भड़काना कितना आसान है ।
एक किताब के प्रसंग मे ही देखें , देखते ही देखते एक कमेंट के विरोध पर समूह मे ऐसी लिंच की प्यास हावी हो गई कि फिर किताब के कॉन्ट्रैक्ट के खत्म होने पर ही शान्त हुई ।
किसी का क्या बिगड़ा।
लेखक लड़ता रहा । आर्थिक नुकसान झेला, वो अलग ।
फिर सब शांत ।
सब पुनः अपनी रवानी में ।
अएं ...
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क्या कोई मिनिमम अहिंसा रूल है , जिसे सब फाॅलो करते है ।
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अगर दर्शन दुरस्त नही है ,तो यूं ही आए -गए होता रहेगा।
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