Some notes on video on jain Darshan by vikas divykirti.
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2:37 - आस्तिक की व्याख्या - अस्ति अर्थात है । नास्तिक अर्थात नही है । आस्तिक को नास्तिक नही किया जा सकता । नास्तिक को आस्तिक नही किया जा सकता ।
वे कौन सी चीजें हैं ,जो हैं -जीव ,अजीव आदि तत्व।
जीव को अजीव नही किया जा सकता ।अजीव को जीव नही किया जा सकता ।
तीर्थंकर की शक्ति भी ये नही कर सकती ।
जैन दर्शन पुरुषार्थवाद का दर्शन है । पर मनुष्य का पुरुषार्थ भी नास्ति को आस्ति नही कर सकता ।
1 : 03 :_ -आत्मा का आकार ही नही ,वजन भी पूछा गया है । यह विषय राजप्रश्नीय सूत्र मे आए हैं ।😊
1:22:_ - भीष्म साहनी के नाटक हानूश का यह सार है कि पहली घड़ी बनाने मे समय लगता है । बाद मे , उस जैसी तैयार करने मे समय नही लगता ।
कुछ इसी तरह का अंतर है -तीर्थंकर और सामान्य केवली में ।
तीर्थंकर अतिशयों से युक्त विशिष्ट ज्ञानी होते हैं जो कैवल्य प्रकट होने के बाद अन्यों के लिए भी सहायक होते है ।
दोनों के ज्ञान मे अंतर नही होता , उपकार की दृष्टि से उन का पूजातिशय अधिक होता है ।
1 :22:_ - सिद्धशिला लोकाकाश के भीतर ही है ।
अलोकाकाश मे तो धर्मास्तिकाय द्रव्य न होने के कारण वहां जीव की गति ही नही है ।
1 :28 :_ - ज्ञान के प्रकार आदि -ये नन्दी सूत्र के विषय हैं।
1:52:_ - तीन वाद का विश्लेषण अच्छा लगा ।
संदेहवाद और अज्ञेयवाद सुनना तो लगभग हौलनाक (anxiety-full) था । अपनी -अपनी तबीयत की बात है । इस तरह की स्थिति मे बंदा गति कैसे करेगा ।
Feels like black hole types. I get choke in these types of talks .
फिर स्याद्वाद ही सही है । वह श्योर नही है । संदेह भी होंगे । अज्ञेय को भी समझता है ,पर अपनी जानकारी के मुताबिक चल तो रहा है ।
2: 44:_ - कैवल्य का लोभ भी तो लोभ है । उत्तर सही था । शास्त्रीय शब्दावली है -यह प्रशस्त राग है ।
लोभ की स्थिति तो 12 वें गुणस्थान तक रहती है ।
मुक्ति और ध्यान में क्लैरिटी नही थी ।
3:07:_ - संथारा का विषय बौद्धिकों मे सबसे ज्यादा न समझा गया विषय है ।
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कुल मिलाकर अच्छा लगा । यह विडिओ सुनते हुए रिअलाइज हुआ कि जाने -पहचाने शब्दों और विषयों का भी राग होता है ।
# While I am not well .
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Now only one month is left to rains . phuhh
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