दरअसल आजीविका वाला प्वाइंट तो सभी पेशों पर लागू है |
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भूख और स्वाद की बात चली ,तो मैं कहूँ कि एक आम इन्सान तो इसका फर्क बता ही नहीं सकता |खाना खाते हुए ये कैसे और कौन डिसाइड करे की क्या खाना भूख-शमन है और क्या खाना स्वाद -पोषण |रोटी के साथ नमक खाएं या अचार |एक सब्जी ठीक रहेगी या दो ले सकते है |तोरी खाना सादापन है या पनीर भी चल सकता है |
विचित्र पेंच हैं |
बहस थोड़ी फिलोस्फिकल हो चली है |दर्शन की बातें बहुत लोगों को हज़म नहीं होती |दीपा जी कहती थी -यह तो शेरनी का दूध है ,सोने के पात्र में ही टिक सकता है |इसे हर कोई पचा नहीं सकता |
.मुझे तो शौक है | सच के साथ सीधे दो दो हाथ करने में मजा आता है |चाहे कमजोर हूँ ,शक्ति के मामले में |शरीर से नहीं |वजन तो मेरा 78 होगा |सर्दियों में और बढ़ जाएगा |खैर ...............
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हमारे यहाँ की चिंतन परंपरा में भूख -शमन को तो अलाउ किया गया है बल्कि भूखे को भोजन कराना पुण्य का काम है | पर स्वाद-पोषण की मनाही की गयी है |क्यों ?
फिर............
आखिर प्राब्लम क्या है ?
प्रॉब्लम कुछ भी नहीं -कहीं भी नहीं ......पर जब हम देखते हैं कि एक ओर इतनी समृधि है और दूसरी ओर इतनी गरीबी , तो विषमता का अहसास मन को कचोटता है |
यह कचोट ,हम खुद देखें या पढ़ें ,जब हमारे भीतर गहरे में धंस जाती है तो self-realisation या आध्यात्मिक शब्दावली में कहूँ तो इन्सान जागृत हो जाता है |जागृति ;फ़िलहाल पाठक इस शब्द को याद रखें |
हम चिंतन के इस ऊँचे पर्वत पर ,बड़ी मुश्किल से ,पहुंचते ही हैं कि तभी फोन की घंटी बज जाती है या और कुछ होता है कि हम फिर से अपनी दुनिया में वापस आ जाते हैं -अरे अभी तो खाना नहीं बनाया .........बेटे को जूते दिलाने थे ....एटसेट्रा एटसेट्रा |पर यह जागृति आपका पीछा नहीं छोडती |आप अपने आपको को कोसते हैं कि क्यों मैं ही ऐसी हूँ ,क्यों मैं सब की तरह एन्जॉय नहीं कर पाती ,पर आपके भीतर की क्लान्ति का कोई निराकरण नहीं होता |
पाठक यह ध्यान रखें कि यह जागृति किसी भी प्रकार से आ सकती है |इसका धार्मिकता से कोई कनेक्शन नहीं है |
अनुपम खेर शो में अनुपम ने काजोल को एक किस्सा सुनाया की उनके पिताजी यह कहा करते कि यह ग्रीस (कलाकारों का मेकअप ) एक बार जिसके मुह पर लग जाये तो जिन्दगी भर नहीं उतरती | देखिये ! कैसी गहरी दार्शनिक बात है| खैर ........
जब चिंतन के ऊँचे पर्वत से आप दोबारा अपनी दुनिया में लोटते हो ,तो आप पाते हो की भूख तो बड़ी दूर की बात है ,अभी तो स्वाद भी कहीं नहीं छूटा है |.....
एक बार हमारे स्कूल में एक ट्रेनी टीचर (पहले पढ़ाई के बाद , एक साल की ट्रेनिंग होती थी |) आये थे |नए नए थे |पढाने के जज्बे से भरे हुए |बाद में परमानेंट होने के बाद तो कहाँ जज्बे बचते हैं | वे साइंस के थे |सौर मंडल के बारे में समझाते हुए उन्होंने उपमा देकर कहा कि पृथ्वी पर रहकर सौर मंडल को जानना ऐसा है कि आप बिस्कुट में बंद होकर बिस्कुट को बाहर से जानना चाहते हो |
जागृति की अवस्था ऐसी ही है |आप हुबलाबुब्लाबू (यह शब्द मैंने गढ़ा है ,उस हजार उलझनों वाली स्थिति के लिए जिसमें आप हैं )के अन्दर हैं पर आप जानते हैं की मुझे इसमें से निकलना है ,कोई रास्ता निकालना है |
जब आप यहाँ तक पहुंच जाते हो ,तब वह क्षण है ,मेरे दोस्त , जब आपके जीवन में भूख और स्वाद के बीच की फांक फट गयी है | ................contd
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भूख और स्वाद की बात चली ,तो मैं कहूँ कि एक आम इन्सान तो इसका फर्क बता ही नहीं सकता |खाना खाते हुए ये कैसे और कौन डिसाइड करे की क्या खाना भूख-शमन है और क्या खाना स्वाद -पोषण |रोटी के साथ नमक खाएं या अचार |एक सब्जी ठीक रहेगी या दो ले सकते है |तोरी खाना सादापन है या पनीर भी चल सकता है |
विचित्र पेंच हैं |
बहस थोड़ी फिलोस्फिकल हो चली है |दर्शन की बातें बहुत लोगों को हज़म नहीं होती |दीपा जी कहती थी -यह तो शेरनी का दूध है ,सोने के पात्र में ही टिक सकता है |इसे हर कोई पचा नहीं सकता |
.मुझे तो शौक है | सच के साथ सीधे दो दो हाथ करने में मजा आता है |चाहे कमजोर हूँ ,शक्ति के मामले में |शरीर से नहीं |वजन तो मेरा 78 होगा |सर्दियों में और बढ़ जाएगा |खैर ...............
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हमारे यहाँ की चिंतन परंपरा में भूख -शमन को तो अलाउ किया गया है बल्कि भूखे को भोजन कराना पुण्य का काम है | पर स्वाद-पोषण की मनाही की गयी है |क्यों ?
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आखिर प्राब्लम क्या है ?
प्रॉब्लम कुछ भी नहीं -कहीं भी नहीं ......पर जब हम देखते हैं कि एक ओर इतनी समृधि है और दूसरी ओर इतनी गरीबी , तो विषमता का अहसास मन को कचोटता है |
यह कचोट ,हम खुद देखें या पढ़ें ,जब हमारे भीतर गहरे में धंस जाती है तो self-realisation या आध्यात्मिक शब्दावली में कहूँ तो इन्सान जागृत हो जाता है |जागृति ;फ़िलहाल पाठक इस शब्द को याद रखें |
हम चिंतन के इस ऊँचे पर्वत पर ,बड़ी मुश्किल से ,पहुंचते ही हैं कि तभी फोन की घंटी बज जाती है या और कुछ होता है कि हम फिर से अपनी दुनिया में वापस आ जाते हैं -अरे अभी तो खाना नहीं बनाया .........बेटे को जूते दिलाने थे ....एटसेट्रा एटसेट्रा |पर यह जागृति आपका पीछा नहीं छोडती |आप अपने आपको को कोसते हैं कि क्यों मैं ही ऐसी हूँ ,क्यों मैं सब की तरह एन्जॉय नहीं कर पाती ,पर आपके भीतर की क्लान्ति का कोई निराकरण नहीं होता |
पाठक यह ध्यान रखें कि यह जागृति किसी भी प्रकार से आ सकती है |इसका धार्मिकता से कोई कनेक्शन नहीं है |
अनुपम खेर शो में अनुपम ने काजोल को एक किस्सा सुनाया की उनके पिताजी यह कहा करते कि यह ग्रीस (कलाकारों का मेकअप ) एक बार जिसके मुह पर लग जाये तो जिन्दगी भर नहीं उतरती | देखिये ! कैसी गहरी दार्शनिक बात है| खैर ........
जब चिंतन के ऊँचे पर्वत से आप दोबारा अपनी दुनिया में लोटते हो ,तो आप पाते हो की भूख तो बड़ी दूर की बात है ,अभी तो स्वाद भी कहीं नहीं छूटा है |.....
एक बार हमारे स्कूल में एक ट्रेनी टीचर (पहले पढ़ाई के बाद , एक साल की ट्रेनिंग होती थी |) आये थे |नए नए थे |पढाने के जज्बे से भरे हुए |बाद में परमानेंट होने के बाद तो कहाँ जज्बे बचते हैं | वे साइंस के थे |सौर मंडल के बारे में समझाते हुए उन्होंने उपमा देकर कहा कि पृथ्वी पर रहकर सौर मंडल को जानना ऐसा है कि आप बिस्कुट में बंद होकर बिस्कुट को बाहर से जानना चाहते हो |
जागृति की अवस्था ऐसी ही है |आप हुबलाबुब्लाबू (यह शब्द मैंने गढ़ा है ,उस हजार उलझनों वाली स्थिति के लिए जिसमें आप हैं )के अन्दर हैं पर आप जानते हैं की मुझे इसमें से निकलना है ,कोई रास्ता निकालना है |
जब आप यहाँ तक पहुंच जाते हो ,तब वह क्षण है ,मेरे दोस्त , जब आपके जीवन में भूख और स्वाद के बीच की फांक फट गयी है | ................contd
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