शनिवार, 17 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानियां -8

संजय लीला भंसाली का सिनेमा 'लार्जर देन लाइफ ' स्टाइल का है ,चाहे कहानी कोई भी हो |अब तो ज्यादातर राजाओं की प्रेम कहानियां दिखाते हैं , जो की उनके स्टाइल को परफेक्टली सूट करता  है ,पर जब विकलागों के ऊपर कहानियां भी दिखाईं हैं ,तो उन्हें भी उसी तरह दिखाया है |मुझे तो ज्यादा पसंद नहीं है ,इस तरह का सिनेमा |पर न हो तो न हो .क्या फर्क पड़ता है |पब्लिक तो  पसंद करती है |glitterati ,a treat to  eyes.

राजू हिरानी जो सिनेमा बनाते हैं ,मुझे लगता है ;वो बहुत हद तक मेरे टाइप का है(जानती हूँ !आपको तो बोस्टिंग लगेगी ) |  इनकी फिल्मो को मैं शांत-रस की फिल्मे कहती हूँ (जैसे की मेरा लेखन भी है -शांत रस का -कोई हड़बड़ी नहीं ,कोई जल्दीबाज़ी नहीं |सब कुछ धीरे धीरे ,अपनी ओर्गेनिक गति से सामने आता है  ) |इनकी फिल्मो में भी एक केरेक्टर ऐसा होता है ,जो एन्लाइटेनड (जागृत )है ,जो हमेशा सिचुएशन से बहुत ऊपर उठकर सोचता है| करण जौहर के साथ बातचीत में करण राजामौली को बोले की -आपके जैसी फिल्म बनाने की मैं सोच भी नहीं सकता |तो राजामौली जी बोले  -आप मेरे  जैसी फिल्म बनाने की नहीं  सोच सकते और मैं राजू हिरानी के जैसी फिल्म का एक सीन भी बनाने की  सोच नहीं सकता |देखिये ! एक जीनियस दूसरे जीनियस का किन शब्दों में सम्मान करता  है |तारीफ करने से अपना कुछ घटता नहीं है .बुराई करने से कुछ बढ़ता नहीं है |
इम्तिआज भी अच्छा सिनेमा बनाते है |मुझे उनकी एप्रोच अच्छी लगती है |
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अनुराग भी ठीक हैं |
राजामौली जी के अन्दर कहानी के प्रेसेंटेशन की समझ जबरदस्त है |

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