आजीविका के प्वाइंट ऑफ़ व्यू से देखें तो हर सफल फिल्म की कहानी अपने आप में पूर्ण उचित है |गुंडे भी क्या बुरी है |फिर मर्डर ,हेट स्टोरी एटसेट्रा बी ,सी ,डी ग्रेड की फिल्मे भी क्यों बुरी है ?< फिर ग्रेडिंग ही क्यों की जाए? <सेंसर क्यों ?............इत्यादि अनगिनत प्रश्न तैयार खड़े हैं ,आप को निगलने के लिए |
सचमुच कठिन है इस बहस में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना |
.................
पर कोशिश तो करनी है |
दरअसल आजीविका का मुद्दा वह ग्राऊंड है जहाँ से इस प्रकार की बहसें उठती हैं ,और यहीं आकर धडाम से गिरती भी है |
और दरअसल यहीं ,इस माध्यम की सीमा (साहित्यिक कहानी के बनिस्पत में ) भी तय हो जाती है |
.................
दरअसल बहुत बारीक़ फर्क है -भूख और स्वाद में ,आजीविका और लालच में |
जब एक बार आप इस राह पर आ जाते हो तो there is no going back .मकड़ी एक पतला सा तार छोडती है कि मैं पेट का गडहा पार कर लूंगी ,पर फिर ,दूसरा -तीसरा बुनते बुनते खुद वह भूल जाती है |एक बड़ा जाल बना डालती है जिसमे कभी खुद ही फंस कर मर जाती है |
इस प्वाइंट ऑफ़ व्यू से जब मैं श्रीदेवी या अन्य हीरोइनों के चमकदार कपडे और स्टाइलिशपने देखती हूँ ,तो ;
फर्स्ट -मैं अपने हिंदीपन को (हाँ ,हमें पता तो होना चाहिए कि हिंदीवाला होने की स्ट्रेंथ क्या है ?)धन्यवाद देती हूँ कि हम इन चीजों को पाने के लिए नहीं लपके |हमने शुरू से अपने आस पास सादा लोग देखे ,जिन्होंने अपने प्यार में जोड़े रखा |सदा यही सिखाया -झुक कर चलना चाहिए |अपनों से नीचे वालों को देखकर चलना चाहिए |एटसेट्रा एटसेट्रा
सेकेण्ड -मुझे उन पर दया आती है |मार्केट में बने रहने की इनकी तड़प -ओहोहोहो |इनके प्रमोशन , इनके इंटरव्यू ,इनके प्रोग्राम ...यूँ ही चलते रहेंगे ,,,जब तक है जान ....जब तक है जान |
सचमुच कठिन है इस बहस में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना |
.................
पर कोशिश तो करनी है |
दरअसल आजीविका का मुद्दा वह ग्राऊंड है जहाँ से इस प्रकार की बहसें उठती हैं ,और यहीं आकर धडाम से गिरती भी है |
और दरअसल यहीं ,इस माध्यम की सीमा (साहित्यिक कहानी के बनिस्पत में ) भी तय हो जाती है |
.................
दरअसल बहुत बारीक़ फर्क है -भूख और स्वाद में ,आजीविका और लालच में |
जब एक बार आप इस राह पर आ जाते हो तो there is no going back .मकड़ी एक पतला सा तार छोडती है कि मैं पेट का गडहा पार कर लूंगी ,पर फिर ,दूसरा -तीसरा बुनते बुनते खुद वह भूल जाती है |एक बड़ा जाल बना डालती है जिसमे कभी खुद ही फंस कर मर जाती है |
इस प्वाइंट ऑफ़ व्यू से जब मैं श्रीदेवी या अन्य हीरोइनों के चमकदार कपडे और स्टाइलिशपने देखती हूँ ,तो ;
फर्स्ट -मैं अपने हिंदीपन को (हाँ ,हमें पता तो होना चाहिए कि हिंदीवाला होने की स्ट्रेंथ क्या है ?)धन्यवाद देती हूँ कि हम इन चीजों को पाने के लिए नहीं लपके |हमने शुरू से अपने आस पास सादा लोग देखे ,जिन्होंने अपने प्यार में जोड़े रखा |सदा यही सिखाया -झुक कर चलना चाहिए |अपनों से नीचे वालों को देखकर चलना चाहिए |एटसेट्रा एटसेट्रा
सेकेण्ड -मुझे उन पर दया आती है |मार्केट में बने रहने की इनकी तड़प -ओहोहोहो |इनके प्रमोशन , इनके इंटरव्यू ,इनके प्रोग्राम ...यूँ ही चलते रहेंगे ,,,जब तक है जान ....जब तक है जान |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें