सोमवार, 19 दिसंबर 2016

# my team -my vision

एक फिल्म थी मोहनजोदड़ो |पता नहीं क्यों  नहीं चली ,जबकि सब कुछ ठीक था |ये तो सब कहते हैं कि क्या चलता है ,कोई नहीं जानता |
मुझे लगता है ,अब इस बात को  ,फ़िलहाल यहाँ ,  ख़त्म करते हैं |
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आज एक बात और याद आ गयी |एक बार मैंने एक क्लब बनाया था -नीरू नॉलेज क्लब ;वह अब भी है पर अब उसका नाम है - संबोध नॉलेज क्लब  |एक बार मैंने fb पर भी जिक्र किया था |इस क्लब को बनाने के पीछे मेरी भावना थी कि बच्चों को -ज्ञान अनंत है -इस सत्य तक पहुँचाया जाए | बाद में मैंने इसे क्लब की टैग लाइन भी बनाया |क्लब की तीन टैगलाइन थी -

  1. ज्ञान अनंत है |
  2. हेल्थ इज वेल्थ 
  3. practice makes a man perfect .
  अब मान  लीजिये ,बच्चों को यह बताना है कि  -ज्ञान अनंत है - तो उन्हें यह लाईन  रोज़ रटवाकर तो कोई मकसद हासिल नहीं होगा |फिर बच्चे ऐसे टिकते भी नहीं है |तो मैंने एक तरीका निकाला ,कि उन्हें कुछ क्राफ्ट ,ड्राइंग एटसेट्रा की एक्टिविटीज़ में लगाया |हमने ५-6 एक्टिविटीज़ की थी -जिसमे हमने एक डेकोरेटिव ट्रे बनायीं थी ,चोकलेट बनाई थी एटसेट्रा
हम हर संडे इकठ्ठे होते थे |पहले प्रेयर गाते थे |वह मैंने महावीर स्तुति का एक पैरा चुना था |इस स्तुति में भगवान को  नमस्कार किया गया है ,जिनकी चेतना में समस्त ज्ञान प्रभासित होता है |संस्कृत में है -
यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिद्चित
सम भ्रान्ति ध्रौव्य वय जनि लसंतोतरहिता .......एटसेट्रा
...फिर हम क्लब की टैगलाइन दोहराते थे और फिर  एक्टिविटी शुरू करते थे |एक्टिविटी करने में बच्चों का मन भी लगता था ,उनका टाइम भी पास होता था ,वे कुछ नया सीखते थे ,और -ज्ञान अनंत है- यह मैसेज वे हर बार दोहराते थे |
इंग्लिश का एक शब्द है (मैंने अभी ऋतिक रोशन के संडे ब्रंच के इंटरव्यू में पढ़ा )-synapse अर्थात प्रक्रियाओं को धीरे धीरे एब्सोर्ब करने की  मस्तिष्क की क्षमता |
मैं बच्चों को यही ग्रहण करना चाहती थी ,कि हर चीज ज्ञान है -ड्राइंग बनाना ,चोकलेट बनाना ,हैयर स्टाइल बनाना ,कविता बनाना ,ड्रेस बनाना एटसेट्रा .............कि ज्ञान अनंत है |
एक बार वे ये सीख लें ,तो वे कभी लाइफ में परेशान  नहीं होंगे |बिकॉज़ उन्हें पता होगा की उनमे  कुछ भी सीखने की क्षमता है |  
क्लब में घर के ही बच्चे थे |दो-दो मेरी जेठानियों के ,तीन मेरे |
बाद में मैं बिजी हो गयी ...........बिजी तो क्या हो गयी ......बस थोडा यूँ ही .....
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दरअसल दुनियादार ,प्रक्टिकल लोगों को ऐसे काम फालतू के लगते है |आजकल ट्यूशन भेजना ज्यादा इम्पोर्टेन्ट समझा जाता है |
मैंने मेरी छोटी बहन से इसका जिक्र किया ,तो वो महारानी कौन सा कम है |फट से बोली कि हम तेरे क्लब में क्यों हाथ बटाये |बताओ ! बित्ते भर की  लड़की और ये गरूर !
उस दिन मैंने जाना कि  व्यक्तिवाचक नाम अहम् को ठेस पहुंचाते हैं  ....खैर ...मुझे तो अहम् का कोई इशू नहीं था ....मुझे तो काम होने से मतलब था ...तो इसलिए मैंने क्लब का नाम बदल कर संबोध कर दिया |संबोध -अर्थात ज्ञान में बराबर |
क्लब तो अब भी है |पर अभी भी चल नहीं रहा है | क्या बताऊँ ......दुनिया की नज़र में आपकी कीमत कागज के टुकड़ों से नापी जाती है |ये हमारे समय का सबसे क्रूर मजाक है |  

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