'ए दिल .........'में एक टिपिकल करण जौहर फिल्म के सारे मसाले हैं |फोरेन लोकेशन ,स्टाइलिश कपडे ,हीरोइन की काजल लगी आखें ,सुपर रिच केरेक्टर्स .........आजकल सारी फिल्मे चमक धमक (glitterati ) वाली हो गयी है |(क्यों ? ......भई ! धन की आसक्ति इंसानों में जबरदस्त होती है )
इन सब पर मैं क्या कमेन्ट करु |सब अच्छा ही था |
मैं तो कहानी और केरेक्टर्स पर बात सकती हूँ |केरेक्टर्स के बारे में कहूँगी कि ऐसे ' केरेक्टर्स ' (थोडा फन्नी सेन्स में भी है )हो सकते है |मैं सहमत हूँ |
बॉलीवुड का असर 70-80 के बाद पैदा हुई पीढ़ी में साफ दिखता है |पहले यह अन्ताक्षरी के रूप में दिखाते थे ,बाद में इसे हीरो के फौरी शौक के रूप में भी कई फिल्मो में दिखाया (किशन कन्हैया ),पर हीरो के ऊपर इसका जूनून ही है ........और यह हीरो -हिरोइन के बीच कनेक्ट का मुख्य कारण है .ऐसा शायद तमाशा में देखा था |(मैं बहुत ज्यादा फिल्मे नहीं देखती हूँ |इन बातों को सिर्फ टिप्पणी समझा जाये )
अयान और अलिजेह भी ऐसे ही हैं |दोनों का कॉमन कनेक्शन बॉलीवुड है |इसके अलावा .............इसके अलावा है ....उनकी सुपर रिच क्लास की लग्ज़री , उनके दंभ ,उनके विखंडित मूल्य ,उनका अकेलापन ....जो की फिल्म में उस तरह से दिखाया नहीं गया है पर समझना मुश्किल भी नहीं है | (ऑफकोर्स कोई आर्ट फिल्म तो नहीं बनानी थी न ).....और इन सबके बीच प्यार पाने की मासूम (जिद्दी )इच्छा|यह इच्छा मासूम है क्योंकि यह दूसरी पार्टी को नुकसान नहीं करती ;मगर जिद्दी भी है कि खुद के लिए कभी समझौता नहीं करती |
फिल्मो के जानकार (शेखर कपूर ,राजामौली ) कहते है कि एक फिल्म में आप दो-चार भावपूर्ण moments क्रिएट कर लो ,बस बहुत है |
इस फिल्म में मुझे रणबीर (2 बार ) और अनुष्का (1 बार )के ब्रेक डाऊन वाले क्षण बहुत प्रभावी लगे |रियल लगे बाकि मैं कहूँगी इस फिल्म में करण ने बहुत ग्रो किया है |वे कहानी कहने में थोड़े बोल्ड हुए हैं |नए इनपुट्स भी लाये हैं (फॉर एग्जाम्पल लास्ट में अलिजेह के एंड को न दिखाना ;वर्ना हिंदी फिल्मों के ड्रामेपन को देखते हुए ऐसी इच्छा रोक पाना बहुत कठिन है )|उनमे एक सर्ज दिखती है ,कहानी को ईमानदारी से कहने की |
वे प्रयोग भी कर सकते हैं |उनके बफ़र्स भी मजबूत हैं |
इन सब पर मैं क्या कमेन्ट करु |सब अच्छा ही था |
मैं तो कहानी और केरेक्टर्स पर बात सकती हूँ |केरेक्टर्स के बारे में कहूँगी कि ऐसे ' केरेक्टर्स ' (थोडा फन्नी सेन्स में भी है )हो सकते है |मैं सहमत हूँ |
बॉलीवुड का असर 70-80 के बाद पैदा हुई पीढ़ी में साफ दिखता है |पहले यह अन्ताक्षरी के रूप में दिखाते थे ,बाद में इसे हीरो के फौरी शौक के रूप में भी कई फिल्मो में दिखाया (किशन कन्हैया ),पर हीरो के ऊपर इसका जूनून ही है ........और यह हीरो -हिरोइन के बीच कनेक्ट का मुख्य कारण है .ऐसा शायद तमाशा में देखा था |(मैं बहुत ज्यादा फिल्मे नहीं देखती हूँ |इन बातों को सिर्फ टिप्पणी समझा जाये )
अयान और अलिजेह भी ऐसे ही हैं |दोनों का कॉमन कनेक्शन बॉलीवुड है |इसके अलावा .............इसके अलावा है ....उनकी सुपर रिच क्लास की लग्ज़री , उनके दंभ ,उनके विखंडित मूल्य ,उनका अकेलापन ....जो की फिल्म में उस तरह से दिखाया नहीं गया है पर समझना मुश्किल भी नहीं है | (ऑफकोर्स कोई आर्ट फिल्म तो नहीं बनानी थी न ).....और इन सबके बीच प्यार पाने की मासूम (जिद्दी )इच्छा|यह इच्छा मासूम है क्योंकि यह दूसरी पार्टी को नुकसान नहीं करती ;मगर जिद्दी भी है कि खुद के लिए कभी समझौता नहीं करती |
फिल्मो के जानकार (शेखर कपूर ,राजामौली ) कहते है कि एक फिल्म में आप दो-चार भावपूर्ण moments क्रिएट कर लो ,बस बहुत है |
इस फिल्म में मुझे रणबीर (2 बार ) और अनुष्का (1 बार )के ब्रेक डाऊन वाले क्षण बहुत प्रभावी लगे |रियल लगे बाकि मैं कहूँगी इस फिल्म में करण ने बहुत ग्रो किया है |वे कहानी कहने में थोड़े बोल्ड हुए हैं |नए इनपुट्स भी लाये हैं (फॉर एग्जाम्पल लास्ट में अलिजेह के एंड को न दिखाना ;वर्ना हिंदी फिल्मों के ड्रामेपन को देखते हुए ऐसी इच्छा रोक पाना बहुत कठिन है )|उनमे एक सर्ज दिखती है ,कहानी को ईमानदारी से कहने की |
वे प्रयोग भी कर सकते हैं |उनके बफ़र्स भी मजबूत हैं |
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