अब बात चल ही पड़ी है तो सोचा फ़िल्मी कहानियों पर कुछ लिखने की बात पेंडिंग थी ,वह भी कह लूँ |क्या पता फिर हम -
कल हो न हो (फ़िल्मी कहानियों की बात चली है तो इतना फिल्मिपन तो बनता है ) खैर .......जोक्स अपार्ट
यह बात तब की है जब हम गुंडे फिल्म देखने गए थे |18-२-१४ को (एक्चुअली उससे पहले गए होंगे ,इस तारीख की तो डायरी एंट्री है ) | पाठक याद करें कि ये ही दिन थे जब मैं कहानीपन के बारे में चिंतनरत थी |
वहां फिल्म देखते हुए लगा कि कितना पैसा बहाया (खर्चा नहीं )जाता है एक nonsensical स्टोरी को दिखाने के लिए |फिर सोचा मैं यहाँ (थिएटर में )क्यूँ हूँ ?<क्योंकि सान्या ,मेरी बड़ी बेटी ,ने जिद की <सान्या ने जिद क्यों की <क्योंकि उसने इस फिल्म का 'टन टन 'वाला गाना टीवी पर देखा था <उसने यह गाना क्यों देखा था ?<क्योंकि टीवी तो बच्चे देखते ही हैं |
in short
फिल्म देखना is not a choice .it is a compulsion . एक्चुअली हमारी लाइफ में से ऑप्शन धीरे धीरे ख़त्म हो रहे हैं |और हम एक बहुत बड़ी धारा में बहे जा रहे हैं |यह हमारी मज़बूरी है |
उस दिन वहीँ बैठे हुए (क्योंकि फिल्म में मुझे ज़रा भी मज़ा नहीं आ रहा था )-
मेरे माइंड में एक ओर हिंदी के आलोचकों(क्योंकि हिंदी से हूँ ) के बाजारवाद के लानत-मलानत के लेख घूम गए (सचमुच वे कितनी मेहनत करते हैं इन सब चीजों को समझने-समझाने की ) और दूसरी ओर महानगरीय सभ्यता पर लिखे (क्योंकि मैंने इस विषय में पीएचडी जमा की है )उन विद्वानों की लिखी हुई किताबों के उद्धरण घूम गए जहाँ उन्होंने महानगर को एक विशालकाय पिंजरा बताया है |
और मैंने हॉल में बैठे हुए सचमुच अपने आप को पिंजरे में बंद किसी पक्षी के समान बेबस महसूस किया |(इन चीजों को इस तरह से सोचना सचमुच बहुत हैवी होता है )
.....
मगर लाइफ तो लाइफ है |वह तो रूकती नहीं | हम बेबस महसूस करें या नहीं आखिर रास्ता क्या है |क्या हो जाता है जानने से ,जब हम उसे बदल नहीं सकते ?...मगर इन्सान और इन्सान की जात आखिर इस तरह निरुपाय होकर भी कैसे बैठे ? .........तब आखिर मैंने सोचा कि क्या हम ऐसी कहानियां नहीं लिख सकते जो meaningful हो |
तो इस तरह मैं फ़िल्मी कहानियों पर सोचने में प्रवृत हुई |
एक बार जो थोट प्रोसेस चला तो then i realize की फ़िल्मी कहानियों पर अब तक की मेरी समझ बौद्धिकतावाद से ग्रस्त बचकानी समझ थी जो इधर उधर के बौद्धिकतावादी रिव्यूस पढ़कर बनी थी .ऐसे रिव्यूस एक खास प्रकार के बौद्धिकतावादी अहंकार से ग्रस्त होकर लिखे जाते है जिनका उद्देश्य अपने पाठकों को आतंकित करना होता है | पाठकों में भी वे इसी प्रकार की रूचि को प्रसारित करते हैं |मेरा इशारा आर्ट फिल्मो की ओर है ,जिन्हें मैं पहले ,अपने इंटेलिजेंट होने के दंभ में जबरन पसंद करती थी |पसंद तो मुझे मेन स्ट्रीम वाली फिल्मे भी थी पर लोगो को बताते हुए मैं आर्ट फिल्मो के नाम ज्यादा लेती थी |
...........................
फ़िल्मी कहानियां भी कहानिया होती हैं ,पर वे सिर्फ कहानियां नहीं होती |
एक फिल्म में बहुत क्षेत्रों का टेलेंट यूज़ होता है |म्यूजिक ,कोस्ट्युम ,मेकअप ,एक्टिंग ,डांस एटसेट्रा एटसेट्रा
एक फिल्म की मेकिंग में बहुत से लोग इन्वोल्व होते हैं |उनका जीवन -आजीविका उस पर निर्भर होती है |
एक साहित्यिक कहानी का लेखक अपने सरोकारों के लिए आजीवन लिख सकता है |इससे सिर्फ उसका जीवन या अधिक से अधिक उसके परिवार का जीवन प्रभावित होगा |
परन्तु एक फिल्म का निर्माता यह रिस्क नहीं उठा सकता |
फिल्म की कहानी के लिए -उसका चलना -सबसे पहली शर्त है |
.......
तो इस तरह सोचते हुए ,डिस्कशन यहाँ तक पहुंची कि कौन सी कहानियां चलती हैं <क्यूँ चलती हैं |
तो इस तरह ख्याल सलमान खान ,अक्षय कुमार वगैरह की फिल्मो की ओर गया और तब स्टारडम ,ब्लोकबस्टर ,ये शब्द दिमाग में आये | .............contd
कल हो न हो (फ़िल्मी कहानियों की बात चली है तो इतना फिल्मिपन तो बनता है ) खैर .......जोक्स अपार्ट
यह बात तब की है जब हम गुंडे फिल्म देखने गए थे |18-२-१४ को (एक्चुअली उससे पहले गए होंगे ,इस तारीख की तो डायरी एंट्री है ) | पाठक याद करें कि ये ही दिन थे जब मैं कहानीपन के बारे में चिंतनरत थी |
वहां फिल्म देखते हुए लगा कि कितना पैसा बहाया (खर्चा नहीं )जाता है एक nonsensical स्टोरी को दिखाने के लिए |फिर सोचा मैं यहाँ (थिएटर में )क्यूँ हूँ ?<क्योंकि सान्या ,मेरी बड़ी बेटी ,ने जिद की <सान्या ने जिद क्यों की <क्योंकि उसने इस फिल्म का 'टन टन 'वाला गाना टीवी पर देखा था <उसने यह गाना क्यों देखा था ?<क्योंकि टीवी तो बच्चे देखते ही हैं |
in short
फिल्म देखना is not a choice .it is a compulsion . एक्चुअली हमारी लाइफ में से ऑप्शन धीरे धीरे ख़त्म हो रहे हैं |और हम एक बहुत बड़ी धारा में बहे जा रहे हैं |यह हमारी मज़बूरी है |
उस दिन वहीँ बैठे हुए (क्योंकि फिल्म में मुझे ज़रा भी मज़ा नहीं आ रहा था )-
मेरे माइंड में एक ओर हिंदी के आलोचकों(क्योंकि हिंदी से हूँ ) के बाजारवाद के लानत-मलानत के लेख घूम गए (सचमुच वे कितनी मेहनत करते हैं इन सब चीजों को समझने-समझाने की ) और दूसरी ओर महानगरीय सभ्यता पर लिखे (क्योंकि मैंने इस विषय में पीएचडी जमा की है )उन विद्वानों की लिखी हुई किताबों के उद्धरण घूम गए जहाँ उन्होंने महानगर को एक विशालकाय पिंजरा बताया है |
और मैंने हॉल में बैठे हुए सचमुच अपने आप को पिंजरे में बंद किसी पक्षी के समान बेबस महसूस किया |(इन चीजों को इस तरह से सोचना सचमुच बहुत हैवी होता है )
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मगर लाइफ तो लाइफ है |वह तो रूकती नहीं | हम बेबस महसूस करें या नहीं आखिर रास्ता क्या है |क्या हो जाता है जानने से ,जब हम उसे बदल नहीं सकते ?...मगर इन्सान और इन्सान की जात आखिर इस तरह निरुपाय होकर भी कैसे बैठे ? .........तब आखिर मैंने सोचा कि क्या हम ऐसी कहानियां नहीं लिख सकते जो meaningful हो |
तो इस तरह मैं फ़िल्मी कहानियों पर सोचने में प्रवृत हुई |
एक बार जो थोट प्रोसेस चला तो then i realize की फ़िल्मी कहानियों पर अब तक की मेरी समझ बौद्धिकतावाद से ग्रस्त बचकानी समझ थी जो इधर उधर के बौद्धिकतावादी रिव्यूस पढ़कर बनी थी .ऐसे रिव्यूस एक खास प्रकार के बौद्धिकतावादी अहंकार से ग्रस्त होकर लिखे जाते है जिनका उद्देश्य अपने पाठकों को आतंकित करना होता है | पाठकों में भी वे इसी प्रकार की रूचि को प्रसारित करते हैं |मेरा इशारा आर्ट फिल्मो की ओर है ,जिन्हें मैं पहले ,अपने इंटेलिजेंट होने के दंभ में जबरन पसंद करती थी |पसंद तो मुझे मेन स्ट्रीम वाली फिल्मे भी थी पर लोगो को बताते हुए मैं आर्ट फिल्मो के नाम ज्यादा लेती थी |
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फ़िल्मी कहानियां भी कहानिया होती हैं ,पर वे सिर्फ कहानियां नहीं होती |
एक फिल्म में बहुत क्षेत्रों का टेलेंट यूज़ होता है |म्यूजिक ,कोस्ट्युम ,मेकअप ,एक्टिंग ,डांस एटसेट्रा एटसेट्रा
एक फिल्म की मेकिंग में बहुत से लोग इन्वोल्व होते हैं |उनका जीवन -आजीविका उस पर निर्भर होती है |
एक साहित्यिक कहानी का लेखक अपने सरोकारों के लिए आजीवन लिख सकता है |इससे सिर्फ उसका जीवन या अधिक से अधिक उसके परिवार का जीवन प्रभावित होगा |
परन्तु एक फिल्म का निर्माता यह रिस्क नहीं उठा सकता |
फिल्म की कहानी के लिए -उसका चलना -सबसे पहली शर्त है |
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तो इस तरह सोचते हुए ,डिस्कशन यहाँ तक पहुंची कि कौन सी कहानियां चलती हैं <क्यूँ चलती हैं |
तो इस तरह ख्याल सलमान खान ,अक्षय कुमार वगैरह की फिल्मो की ओर गया और तब स्टारडम ,ब्लोकबस्टर ,ये शब्द दिमाग में आये | .............contd
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