प्रेम का एक रूप ऐसा है जिसमे सती शिव और शिव सती हो जाते है । उत्कर्षता में यह रूप भक्ति,पूजा के समकक्ष हो जाता है ।
निश्चित रूप से इसमे शक्ति है अलौकिक से भी लड़ जाने की ।
....यह दृष्टि की बात है ।
संसार विरत दृष्टि मे करूणा महत्वपूर्ण हो जाती है ।
....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें