यह पुरानी पोस्ट है । ' गति ' शब्द से चेतना मे एक झटका लगने की बात पहले भी दर्ज की है ।उस समय के लिखने के लहजे में -
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जब मैंने रामप्रसाद जी म को बताया कि वीर स्तुति याद हो गयी तो उन्होंने शाबासी दी ,कहा -वीरता का काम किया है |
फिर गुरुओं के जाने का दिन भी आया |चातुर्मास अधिकतर अक्तूबर -नवम्बर में ख़त्म होते हैं |सुन्दर मुनिजी उलटी गिनती का एक एक दिन गिनते थे |भक्त इमोशनल होते थे |बहने रोने लगती थी |पर मेरे भीतर ज़रा भी उदासी नहीं थी |मैं प्रसन्न थी ,परम प्रसन्न |मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई थी वह इतनी सघन और ठोस थी कि दिल करता था ऐसी प्रसन्नता सब को मिले |ये सब को ऐसी प्रसन्नता देते चलें |गुरुओं के विहार के दिन उन्हें छोड़ने गए |सड़क के ट्रेफिक से बचाने के लिए मानव-चेन बनाई |
फिर ...........................
फिर क्या हुआ ?.........
फिर विरह हुआ | 6 बजे पार्क में ,सर्दियों के कोहरे में ,ऐसा लगता था की गुरूजी कोहरे में से निकल कर अभी सामने आ खड़े होंगे |
पाकिस्तान की रेशमा ने गाया है 'चार दिना दा प्यार ओ रब्बा लम्बी जुदाई '|यहाँ चार दिन का नहीं चार महीने का प्यार था |खैर ...
सर्दी बीतते विरह कुछ कम हुआ |(ऐसी चीजें ठंडे मौसम में ज्यादा असर करती है ) मेरा एडमिशन MA हिंदी में हो गया था |पेपर आने वाले थे |मैं वहां लग गयी |मेरी लाइफ में ये दो चीजें साईड बाई साईड चली हैं |
अब आते हैं जे डी की कहानी पर ,जो अब तक की कहानी में एक परिचित पात्र तो रहा है ,पर अभी तक उसका ज्यादा रोल नहीं आया है |
पहले छुट -पुट परिचय और बाद में गुरूजी के यहाँ जे डी को देखकर मुझे यह तो पता लग ही गया था कि यह कोई महत्व्पूर्ण आदमी है |
यह उस दिन की बात होगी जब डेढ़ -दो घंटा अलग अलग ,लम्बी लम्बी लाइनों में लगकर आखिर मैंने अपना एडमिशन MA हिंदी में कराया था | सोल की उस पुरानी बिल्डिंग को और वहां की गंदगी देखकर मुझे यकीं नहीं हो रहा था कि मैं यहाँ !!!!!(@##%$$^&&*)से MA कर रही हूँ कि यहाँ !!!!!(@##%$$^&&*) से भी MA कराई जाती है |
पर क्या निदान था ? मन माने या नहीं पर यह सच था |पर मुझे झटका बहुत बड़ा लगा था |इतना की ,कुछ देर मैं गुमसुम वहीँ खड़ी रह गयी थी |उस दिन उमस थी |तभी -
पहले बोले गति चार - नीम के पेड़ के पीछे से एक महीन आवाज़ आई |
हैं ,यह कौन बोला -मैंने मुड़कर देखा तो जे डी वहाँ खड़े थे| 'अरे आप ,आप यहाँ कैसे ?'
क्या तुम भूल गयी |पहले बोले गति चार |
जी ,क्या मतलब |(जे डी मेरी बातों के जवाब नहीं देते थे ,बस अपनी बात बताते थे )
मतलब वही ,जो तुमने बचपन में याद किया था |25 बोल का थोकडा |उसका पहला बोल -पहले बोले गति चार |
हाँ वह तो मुझे याद है |पहले बोले गति चार -नरक गति ,तिर्यंच गति ,मनुष्य गति ,देव गति | तो ............?
तो .... आज तुम इतनी आश्चर्य चकित क्यों हो ?तुम गति करके यहाँ आई हो |यह बिल्डिंग तो जहाँ थी वहीँ है |
क्या मतलब?
मतलब की मनुष्य गति करते हैं |सभी गतियों में जीव गति करता है |गति चार हैं |
..........................हैं !!!!........................हे राम ........हे भगवान .............मुझे उनकी बातें सुनकर चक्कर आ रहा था |उन्होंने मुझे सहारा देकर लाइब्रेरी की तरफ पैडी पर बिठाया |और मुझ पर रुमाल से पंखा झलने लगे |
इसके बाद वे बहुत देर तक कुछ बोले नहीं |मैं भी नहीं बोली |मैं अभी भी सकते में थी |दो ढाई घंटे हम यूँ ही बैठे रहे |चुपचाप |गुमसुम |शाम हो रही थी |मैं बस लेकर घर आ गयी |यह थी जे डी से मेरी लम्बी दोस्ती की पहली मुलाकात |
थोकडा - जैन शास्त्रों में जो भी दार्शनिक विषय आये हैं ,आचार्यों ने उनका संग्रह करके संक्षिप्त में याद करने योग्य थोकडो में बना दिया है |इन्हें जैन दर्शन की ABCD समझिये |
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आज उस बात को याद करती हूं तो मुझे लगता है गति शब्द ने मेरी चेतना को झटका दिया क्योंकि मैं रट तो ' गति ' रही थी पर मेरे मन में इसे ' स्थिति ' समझ रही थी ।
नरक स्थिति भी है । प्रवचनों में यह विषय आते हैं कि इस तरह सात नरक है ।इनमें पापी जीवो को इस तरह अपने पापों का दंड भुगतना पड़ता है इत्यादि
' हमने कौन सा जाना है' - यह वर्णन सुनते हुए ऐसा विश्वास स्वभाविक ही हम अपने मन में बना लेते हैं। अपने जीवन को धर्मविहित, लोक विहित आचरण के अनुसार जीते हुए यह 'गारंटी' भी तो धर्म ही देता है।
बहरहाल उस झटके ने आत्मा की तरह तंद्रा तोड़ी थी और मुझे यह ख्याल हुआ था कि हमारे शास्त्रों में जो भी विषय आए हैं ,वे सच्चे हैं ।यह एक बहुत बड़ी बात है ।
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