महावीर वाणी सीरीज के अंतर्गत वीडियो बनाते हुए मुझे ख्याल हुआ कि बेशक शास्त्र पढने की शुरुआत 2002 मे उत्तराध्ययन सूत्र से हुई पर धर्म से और महावीर वाणी से जुड़ने की एक पूर्वपीठिका भी है, वह भी मुझे दोस्तों के साथ शेयर करनी चाहिए। पूर्वपीठिका के अंतर्गत दो मुख्य बातों को दर्ज करना चाहती हूं -
1 कर्म सिद्धांत को समझने की असमर्थता
2 गति शब्द से चेतना में झटका
1- यह हमारे पीतमपुरा में रहने के दौरान की बात है। हम वहां करीब 7-8 साल रहे थे। पहले 3 साल एक फ्लैट में दूसरे 4 साल जिंदल आंटी के यहां । उनकी बेटी रेखा गुप्ता अब राजनीति में है। उन्होंने मेयर का चुनाव भी लड़ा था ।
हमारे फ्लैट के सामने ही जैन स्थानक थी ।बिल्कुल सामने ।उस समय में छठी में पढ़ती थी। हम दोनों भाई बहन को स्थानक की लाइब्रेरी से लाकर धार्मिक नाॅवेल और कहानियां पढ़ने का शौक लगा था। कॉमिक बुक्स भी पढ़ते थे। किताबें पढ़ने का शौक बाद जीवन में भी यूं ही चलता रहा।
धार्मिक नाॅवेल में मुख्य रूप से केवल मुनि जी के लिखे हुए थे जिनमें अमर कुमार का चरित्र, भविष्यदत्त की कथा ,मैना सुंदरी-सुर सुंदरी की कथा, प्रद्युम्न चरित्र इत्यादि थे । इन नाॅवेल का पैटर्न लगभग एक सा था । नायक, नायिका का संघर्षपूर्ण जीवन ,बाद में मुनि प्रेरणा से इन्हें कर्म का फल बताकर धार्मिक संदेश के साथ समापन ।
यह नाॅवेल पढ़कर मुझे कर्म सिद्धांत को समझने में अपनी असमर्थता स्पष्ट महसूस हुई। मसलन रानी देवकी के अपने पुत्र कृष्ण से वियोग को पूर्व जन्म में मोरनी के अंडे को 16 घड़ी तक छुपाने का फल कहना, यह मुझे बहुत लॉजिकल नहीं लगा था ।
हे प्रभु ! इंसान तो कुतूहल वश अज्ञानता मे ऐसी छोटी-छोटी भूलें कर ही देते है तो क्या ऐसे कर्मों की इतनी भयंकर सजा मिलती है कि एक रानी को उसके पुत्र से 16 साल तक बिछड़ना पड़ा ।
यह मेरा उस समय का चिंतन था । इसका परिणाम यह हुआ कि जैन दर्शन को सीखने- समझने के क्रम में कर्म सिद्धांत को समझने में मेरी तत्परता कभी नहीं बनी । मैं इस विषय से बचती भागती थी ।
शास्त्र पढ़ने की रुचि दूसरे अनुशासनों के अभ्यास से बढ़ी । शब्द विज्ञान और साहित्य इनमें प्रमुख है । शास्त्रों का मूल विषय दर्शन उस तरह कभी मेरे चिंतन का विषय नहीं बना । दर्शन तक मैं अपने स्वयं के चिंतन की वीथी को पार करके पहुँची ।
2 यह भी पीतमपुरा की बात है । स्थानक मे एक संत संघाटक कई वर्षों से स्थिरवास मे थे । बुजुर्ग संत जब विहार की स्थिति में नहीं रहते तो वे एक जगह स्थिरवास कर लेते हैं । फिर उनकी आयु पूर्ण होने पर बाकी संत बिहार करते हैं । उनके यहां मैंने सामायिक के 9 पाठ और 25 बोल का थोकडा सीखे थे । जैसे माएँ बेटियों को दाल -चावल , रोटी बनाना सिखा देती है कि आगे चलकर काम आएगा ।उसी तरह पहले के संत बच्चों को 9 पाठ सिखा देते थी कि सामायिक करने में काम आएंगे।
जैन परंपरा में सामायिक हमारी पूजा पद्धति है । बचपन में तो कोई करता नहीं । जब बड़े होंगे , घर गृहस्थी के दुखों में दुखी होकर चिंघाडेंगे; तब जाकर धर्म की ओर , सामायिक करने की इनकी बुद्धि जागृत होगी तब ये पाठ काम आएंगे । इस सोच के साथ पहले के संतों का जोर सामायिक के नौ पाठ याद कराने पर रहता था । 9 पाठ याद हो गए तो फिर 25 बोल की ओर बढ़ो ।
यह हमारे हरियाणा के संत- श्रावक समाज के बीच ज्ञान का बुनियादी ढांचा था । हमारे मम्मी-पापा की पीढ़ी मे सामायिक लेने - खोलने का पाठ या 1-2 भजन । उससे भी पहले हमारे बाबा - दादी की पीढ़ी में स्त्रियों में तो शायद वह भी नहीं , पुरुष जानते होंगे । हमारी पीढ़ी तक यह जमाना था । अब तो हमारे यहां स्वाध्याय की क्रांति की आई हुई है । चातुर्मास में चार पुस्तकों का स्वाध्याय पेपर देने के माध्यम से हो जाता है । यह सब शिक्षा के कारण हुआ है ।
25 बोल का थोकड़ा संख्यात्मक शैली में शास्त्रीय विषयों से परिचय कराने का अभ्यास है । यह सबसे छोटा थोकड़ा है । इसमें एक से लेकर 25 की संख्या तक विभिन्न विषय आए हैं । जैसे -
पहले बोले -गति 4 - नरक गति , तिर्यंच गति, मनुष्य गति , देव गति ।
दूसरे बोले -जाति 5- एकेंद्रीय , बेंद्रीय , तेंद्रीय ,चौंद्रीय , पंचेद्रीय।
इत्यादि।
इस थोकडे में गति जाति इंद्रिया काय प्राण योग उपयोग इस तरह 25 विषयों का परिचय हो गया । यह सब विषय जैन दर्शन की आरंभिक वर्णमाला है । मैं और मेरा भाई और अन्य बच्चे तो उस समय रट लेते थे । इनाम मिलने के लालच में जल्दी-जल्दी रटकर संतो को पाठ सुनाने की होड रहती थी ।
....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें