रविवार, 2 अप्रैल 2023

क्या किसी ठीक-ठाक होश-हवास के आदमी के लिए यह मानना उचित है कि एक राजनीतिक रैली मे दिए गए भाषण मे वह अपने सरनेम का अपमान मान ले ।

जाहिर तौर पर इसका उत्तर होगा ना ।

पर भाव -क्षेत्र मे ऐसी संभावना सर्वथा असंभव नही है । जब लोगों को कास्ट,कलर ,जेंडर एटसेटरा के लिए बेवजह सतत प्रताड़ित होना पड़ता है ,तब वे आहत महसूस करते हैं ।

एक फिल्म बनाई गई है -my name is khan .उसमे यही इशू है ।बट ! मजेदार बात यह है कि कला को भी क्रेडिबल होने के लिए इस कल्पना का सहारा लेना पड़ा है कि हीरो असामान्य है ।वह बेदिमाग नही है ।बल्कि उसकी जानकारियां एक सामान्य मनुष्य से बढ़कर हैं ।बट वह जुनूनी,जिद्दी सा है ।क्योंकि ऐसा हीरो ही तो कहानी के संदेश के मुताबिक इतना जोखिम उठाएगा ।

#संसार के नियम#कला के नियम #धारणाओं के सच #सत्य की विचित्रता 

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असली दुनिया मे ऐसी संवेदनाएं बदलाव का कारण बनती हैं ।  पर वह प्रक्रिया धीमी है । वह जागरूकता-सामाजिक चेतना- आन्दोलन से होती हुई 'हिस्टोरिक प्रोसेसेस' के द्वारा कानून बनती है।


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