शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

आज सुशोभित की पोस्ट पढ़कर मुझे ये ख्याल हुआ कि कितना बढ़िया हो गर हमारे बौद्धिकों मे जीवन के श्रेष्ठ मूल्यो के प्रति सहमति हो ।

कल्पना करती हूं कि एक सभा मे सुशोभित ने आज की पोस्ट के उद्गार कहे है और सभा मे सन्नाटा खिंच गया है । सभी ने बात के सहीपन को पहचाना है ।

साथ ही ये कल्पना भी कर रही हूं कि इस पोस्ट मे व्यक्त हो रहे अपार हाहाकार से सुशोभित भी बाहर आए । कोई एक इंसान इतना दर्द नही ले सकता है । हम यही करके संतोष पा सकते है कि हम बचे हुए हैं ।

इंसान के चेतना परिवर्तन की तीन स्टेजिज बताई गई है जो आगे से आगे दुर्लभतम होती जाती है - सुनना ,श्रद्धा, वीर्याकार पराक्रम ।

हम सु-श्रद्धा पा लें  यह भी बहुत बड़ी उपलब्धि है ।

एक साधक को अपने प्रयासो मे अनवरत गतिमान होते हुए भी यह तथ्य याद रखना चाहिए कि " यह संसार ऐसे ही चलता रहा था ,यह संसार ऐसे ही चल रहा है , यह संसार ऐसे ही चलता रहेगा "(महावीर वाणी )

यह वाणी ही संतप्त मन को शान्ति प्रदान करती है ।

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