उत्तराध्ययन सूत्र के बाद जैन आगम पढ़ने की शुरुआत हो गई थी । बहुत पहले ही मैं रोज सामायिक करने लगी थी । सामायिक हमारी पूजा पद्धति है । इसमें आसन बिछाकर जमीन पर या अशक्त हो तो मोढे पर या कुर्सी पर बैठ कर , मुंह पर सफेद मुँहपट्टी लगाकर 48 मिनट एक स्थान पर बैठना होता है । इस बीच कुछ खाना पीना नहीं । धार्मिक किताबें पढ़ सकते हैं या फिर माला फेर सकते हैं ।
बहन ! अगर तुम रोज सामायिक करती हो तो उसमें 15 मिनट शास्त्र की स्वाध्याय किया करो - हमारे एक परिचित संत ने कहा था ।। मैंने वह नियम ले लिया। इतने छोटे से नियम ने हीं मेरे जीवन में चमत्कार भरना शुरू कर दिया ।
शायद पहले पहल यह नियम ही प्रेरणा बना था , शास्त्र पढ़ने के लिए। बाद में मेरी खुद की रुचि भी जाग गई। अगला शास्त्र दशवैकालिक था । एफबी पर एक बार मैने शास्त्र पढ़ने के क्रम की सूची पोस्ट की थी। इस सूची में 19 वें सूत्र पर तारीख और साल है ।उससे पहले के लगभग 15 साल के बीच पढ़े गए शास्त्रों की क्रम और साल के विषय में मैं निश्चित नहीं हूं ।इस तरह शास्त्रों के क्रम की सूची बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी इसका कारण बड़ा ही सरल है।
हमारे सेठ जी महाराज की आवाज बहुत महींन है । उनके आसपास का माहौल ही ऐसा है कि उनके सामने अधिक जोर से बार-बार बोलना अखरता है । सब धीमी आवाज मे बात करते हैं । जैसे जैसे मैं शास्त्र पढ़ती गई, सूची बढ़ती गई।
मैं गुरुदेव के पास जाकर पूछती- गुरुजी अगला शास्त्र कृपा कर दो । कौन-कौन से पढ़ लिए - गुरुजी पूछते ।
इस तरह बढ़ी हुई सूची में खुद मुझे याद रहे और गुरु जी स्वयं पढ़ कर देख ले - मैंने डायरी में सूची बनाई थी।
जैसे ही गुरूदेव पूछते- कौन-कौन से पढ़ लिए , मैं तुरंत डायरी आगे कर देती थी ।बाद में ठाणांग सूत्र के बाद से मैंने इस सूची में तारीख और साल लिखना शुरू किया ।
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मन ,बुद्धि, आत्मा - जैन आगमों के विषय विविध है । मोटे तौर पर इनका विभाजन करना चाहे तो निवृत्ति मूलक और प्रवृत्ति मूलक -यह दो कैटेगरी बना सकते हैं ।
निवृत्ति मूलक विषयों मे संसार की असारता ,जीवन की अनित्यता,शरीर की अशुचिता , मोह की भयंकरता, धर्म प्राप्ति की दुर्लभता, काम भोगों की क्षण भंगुरता आते है।
प्रवृत्ति मूलक विषयों मे ज्ञान, दर्शन, चरित्र का महत्व ,विनय का महत्व, पंच महाव्रत एवं अणुव्रत का पालन आदि है ।जैन कथाएं हैं। लोक के नक्शे हैं ।भूगोल है ।गणित है ।
एक बार जैन आगम पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ तो वह आज तक बदस्तूर जारी है ।यह बात पहले भी आ चुकी है की शुरुआत से ही आगमों के प्रति रुचि दर्शन के कारण उतनी नहीं अन्य अनुशासन के कारण ज्यादा बनी थी ,जिनमें शब्द विज्ञान और साहित्य मुख्य हैं ।
दर्शन की मेरी रुचि एक दूसरे ट्रैक पर से होकर बनी जिसका उल्लेख आगे किया जा रहा है।
यह मन क्या है?
यह शरीर में कहां होता है?
क्या यह ह्रदय नामक उस अंग में स्थित होता है जिसे शरीर का विज्ञान बताता है कि वह बाएं तरफ होता है ?
ये कुछ प्रश्न थे जो मेरे मन में तीव्रता से उठते थे । मैं इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए बहुत लालायित थी ।
उस वक्त तक (अर्थात समझो 2008-9, अंदाजे से लिख रही हूं) मैंने जितने भी आगम पढे थे, इनमें संतोषजनक उत्तर नहीं मिला था। 25 बोल में-
आठवां बोल -योग 15 में- मन के चार योग बताए गए हैं -सत्य , मृषा , सत्यामृषा , नो सत्यामृषा । पर इससे भी कोई बात नहीं बनी । मुझे ज्यादा समझ नहीं आया ।
हमारे घर भगवत गीता आई थी। मेरी बड़ी बेटी सान्या स्कूल की ओर से पिकनिक पर लोटस टेंपल गई थी । वहां सब बच्चों को मुफ्त में यह किताब बांटी गई थी । बाद में छोटी बेटी को भी वहीं से यह किताब दोबारा मिली । धार्मिक लोग धार्मिक किताबों का वितरण धर्म समझकर करते है ।
बहुत दिनों तक यह घर में रखी थी । मैंने सोचा क्यों ना मैं यह किताब पढूं । देखती हूं इसमें क्या लिखा है । इस तरह पूरे मनोयोग से ,आदर सहित मैंने इस किताब को पढ़ना शुरू किया । इस किताब की तीसरे चैप्टर में आखीर में कुछ श्लोक हैं जिनका भावार्थ यह है कि इन्द्रियों से बढ़कर मन की ताकत है । मन से बढ़कर बुद्धि की ताकत है और बुद्धि से बढ़कर आत्मा की ताकत है ।
तो इस तरह एक सूत्र मेरे मन में स्थापित हुआ ।मन<बुद्धि< आत्मा ।मन काम के अधीन है। यह चिर अतृप्त है। इसे तृप्त नहीं किया जा सकता। इत्यादि
इस तरह मुझे 'मन क्या है' का संतोषजनक समाधान तो नहीं मिला पर यह सूत्र बड़े काम का था ।मैंने इस सूत्र को अपने मन में बिठा लिया।
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